देहरादून, https://dhadkannews.com : आज उत्तराखंड की हवा में एक अजीब-सी खामोशी है। यह सिर्फ एक पूर्व मुख्यमंत्री के निधन की खबर नहीं, बल्कि उस राजनीतिक चरित्र के विदा होने का क्षण है जिसकी चर्चा आज की राजनीति में कम ही सुनाई देती है।
पूर्व मुख्यमंत्री बी.सी. खंडूरी अब इस दुनिया में नहीं रहे।91 वर्ष की उम्र में उन्होंने अंतिम सांस ली, लेकिन अपने पीछे सिर्फ राजनीतिक उपलब्धियां नहीं, बल्कि एक सवाल छोड़ गए हैं— क्या राजनीति अब भी इतनी ईमानदार, सख्त और सादगीपूर्ण हो सकती है? खंडूरी उन नेताओं में नहीं थे जो कैमरों की फ्लैश में चमकते थे। वे उन लोगों में थे जो फाइलों पर झुककर फैसले लेते थे और मंचों से ज्यादा काम की भाषा समझते थे।
सेना की पृष्ठभूमि से आए खंडूरी ने सत्ता को कभी ‘विशेषाधिकार’ नहीं माना। उनके लिए कुर्सी जिम्मेदारी थी, प्रदर्शन का मंच नहीं। जब राजनीति में बयानबाजी का दौर तेज हुआ, तब भी उनकी पहचान शोर नहीं, काम रही। विडंबना देखिए— जिस दौर में राजनीति का मूल्यांकन सोशल मीडिया फॉलोअर्स और भाषणों की तालियों से होने लगा है, उसी दौर में खंडूरी जैसे नेता चुपचाप विदा हो जाते हैं। उनके जाने पर शोर कम है, लेकिन खालीपन गहरा है। आज जब हर दल “सुशासन” की बात करता है, तब खंडूरी का जीवन याद दिलाता है कि सुशासन भाषणों से नहीं, निजी ईमानदारी से पैदा होता है। बी.सी. खंडूरी का निधन सिर्फ एक व्यक्ति की मृत्यु नहीं है। यह उस पीढ़ी के धीरे-धीरे खत्म होने की दस्तक है जिसने राजनीति को पेशा नहीं, कर्तव्य माना था।
उत्तराखंड उन्हें पूर्व मुख्यमंत्री के तौर पर याद रखेगा, लेकिन इतिहास उन्हें उस आखिरी पीढ़ी के प्रतिनिधि के रूप में याद करेगा जिसने सत्ता से पहले सिद्धांत चुना था।



