ज्योति सिंह
नई दिल्ली, https://dhadkannews.com : देश का युवा आज एक ऐसे दौर से गुजर रहा है, जहां मेहनत उसकी है, संघर्ष उसका है, लेकिन नतीजों का फायदा कहीं और जाता दिख रहा है। एक तरफ लाखों छात्र-छात्राएं NEET जैसी कठिन परीक्षा की तैयारी में सालों खपा देते हैं, दिन-रात एक कर देते हैं, परिवार अपनी जमा-पूंजी कोचिंग और पढ़ाई पर खर्च कर देता है, लेकिन परीक्षा पास करने के बाद भी मंजिल साफ नहीं दिखती।
इस बार NEET परीक्षा में पेपर लीक और अनियमितताओं के आरोपों ने छात्रों के भरोसे को और गहरी चोट पहुंचाई है। देशभर में छात्रों ने सड़कों पर उतरकर प्रदर्शन किया, निष्पक्ष जांच और दोबारा परीक्षा की मांग उठाई। लगातार बढ़ते दबाव और हंगामे के बाद जांच एजेंसियां सक्रिय हुईं और कई गिरफ्तारियां भी हुईं। लेकिन बड़ा सवाल अब भी कायम है—अगर परीक्षा व्यवस्था इतनी मजबूत है तो फिर हर बड़े एग्जाम के बाद पेपर लीक और गड़बड़ियों की खबरें क्यों सामने आती हैं? और अगर गड़बड़ी हुई है, तो इसकी कीमत मेहनत करने वाले लाखों छात्रों को क्यों चुकानी पड़ती है?
NEET का परिणाम आने के बाद भी छात्रों की असली परीक्षा खत्म नहीं होती। काउंसलिंग की लंबी प्रक्रिया, सीटों की सीमित संख्या, बढ़ती फीस और सरकारी मेडिकल कॉलेजों में कम अवसर युवाओं के सपनों पर भारी पड़ते हैं। लाखों छात्र अच्छे अंक लाने के बावजूद दाखिले से वंचित रह जाते हैं। ऐसे में सवाल उठना लाजिमी है कि जब व्यवस्था पर्याप्त सीटें और अवसर नहीं दे सकती, तो हर साल इतने बड़े स्तर पर उम्मीदें क्यों जगाई जाती हैं? यह संकट सिर्फ NEET तक सीमित नहीं है। देशभर में सरकारी भर्तियों की तस्वीर भी कम चिंताजनक नहीं है। कहीं परीक्षाएं सालों तक अधर में लटकी रहती हैं, कहीं पेपर लीक हो जाते हैं, कहीं रिजल्ट आने में महीनों लग जाते हैं और कहीं चयन प्रक्रिया अदालतों में उलझ जाती है। युवा अपनी उम्र, ऊर्जा और उम्मीदें इन प्रक्रियाओं में झोंक देता है, लेकिन बदले में उसे सिर्फ इंतजार मिलता है।
सबसे बड़ा विरोधाभास यह है कि सत्ता के मंचों से युवाओं को “देश का भविष्य” बताया जाता है, लेकिन जब यही युवा रोजगार, पारदर्शिता और जवाबदेही की मांग को लेकर सड़कों पर उतरता है तो कई बार उसके हिस्से में आश्वासन नहीं, बल्कि लाठीचार्ज, प्रशासनिक सख्ती और चुप्पी आती है। सवाल पूछना अगर लोकतंत्र की बुनियाद है, तो युवाओं की आवाज़ को दबाने की कोशिश क्यों? विशेषज्ञों का मानना है कि भारत दुनिया के सबसे युवा देशों में शामिल है और यही युवा शक्ति देश की सबसे बड़ी पूंजी हो सकती है। लेकिन अगर यही पीढ़ी बेरोजगारी, अनिश्चितता और टूटी उम्मीदों से जूझती रही, तो इसका असर सिर्फ व्यक्तिगत भविष्य पर नहीं बल्कि देश की आर्थिक और सामाजिक प्रगति पर भी पड़ेगा।
आज जरूरत सिर्फ नई घोषणाओं की नहीं, बल्कि ठोस नीतियों और समयबद्ध क्रियान्वयन की है। परीक्षाओं को पारदर्शी बनाना, पेपर लीक जैसे अपराधों पर सख्त कार्रवाई करना, भर्तियों को तय समय सीमा में पूरा करना और शिक्षा के बाद रोजगार के वास्तविक अवसर उपलब्ध कराना सरकार की प्राथमिकता होनी चाहिए।
देश का युवा अब सिर्फ भाषण नहीं, जवाब चाहता है। क्योंकि किताबों में भविष्य गढ़ने वाला युवा, आज सड़कों पर अपने हक की लड़ाई लड़ने को मजबूर है। सवाल यही है कि आखिर यह इंतजार कब खत्म होगा?



