Sunday, July 5, 2026
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हर आग के बाद शोक, हर हादसे के बाद मौन… आखिर कब रुकेगा मौत का खेल?

ज्योति सिंह 

लखनऊ, https://dhadkannews.com : देश की राजधानी दिल्ली के मालवीय नगर स्थित फ्लरिश स्टे होटल में 21 लोगों की मौत के बाद पूरे देश में फायर सेफ्टी को लेकर बहस छिड़ी थी। प्रशासन ने सख्ती की बातें कीं, जांच के आदेश दिए गए, अवैध निर्माणों की सूची बनाने के दावे हुए और जिम्मेदारों पर कार्रवाई का भरोसा दिलाया गया।

लेकिन कुछ ही दिनों बाद उत्तर प्रदेश की राजधानी लखनऊ में आग ने 15 मासूम और युवा जिंदगियों को निगल लिया। एक बार फिर वही तस्वीरें सामने आईं—धुएं से घिरी इमारत, मदद के लिए चीखते लोग, जान बचाने के लिए खिड़कियों से कूदते छात्र और घटना के बाद सक्रिय होता प्रशासन। सवाल यह है कि क्या हम हादसों से सीखते भी हैं या केवल उन्हें भूलने की आदत डाल चुके हैं?

हादसे नहीं, व्यवस्था की विफलता
दिल्ली और लखनऊ की घटनाएं अलग-अलग राज्यों में हुईं, लेकिन दोनों के कारण लगभग एक जैसे दिखाई देते हैं—

  • फायर सेफ्टी नियमों की अनदेखी
  • भवनों का अवैध या बदला हुआ उपयोग
  • नियमित निरीक्षण का अभाव
  • जिम्मेदार अधिकारियों की उदासीनता

लाभ कमाने की होड़ में सुरक्षा से समझौता किया जाता है। जब तक कोई हादसा नहीं होता, तब तक कागजों में सब कुछ ठीक नजर आता है। लेकिन जैसे ही आग लगती है, वही कागज, वही प्रमाणपत्र और वही निरीक्षण रिपोर्टें सवालों के घेरे में आ जाती हैं।

मौत के बाद जागता है सिस्टम
भारत में हर बड़े हादसे के बाद एक तयशुदा प्रक्रिया दिखाई देती है— पहले शोक संदेश, फिर मुआवजे की घोषणा, उसके बाद जांच समिति, कुछ दिनों तक मीडिया की सुर्खियां, और फिर सब कुछ सामान्य। लेकिन जो परिवार अपने बच्चों, माता-पिता या जीवनसाथी को खो देते हैं, उनके लिए कुछ भी सामान्य नहीं होता।
दिल्ली में 21 मौतों के बाद भी यदि लखनऊ में 15 लोगों की जान चली जाती है, तो यह केवल एक दुर्घटना नहीं बल्कि उस सिस्टम की असफलता है जो हादसों को रोकने के लिए बनाया गया था।

क्या सिर्फ बिल्डिंग मालिक दोषी हैं?
हर बार जांच की सुई भवन मालिक या संचालक पर आकर रुक जाती है। लेकिन बड़ा सवाल यह है कि यदि कोई इमारत वर्षों से नियमों के विरुद्ध चल रही थी तो संबंधित विभाग क्या कर रहे थे? यदि फायर एनओसी, भवन मानचित्र, व्यावसायिक अनुमति और सुरक्षा मानकों की नियमित जांच होती, तो क्या इतनी बड़ी त्रासदियां टाली नहीं जा सकती थीं? जिम्मेदारी केवल मालिक की नहीं, बल्कि उस पूरे प्रशासनिक ढांचे की भी है जिसने समय रहते खतरे को नजरअंदाज किया।

अब सिर्फ कार्रवाई नहीं, जवाबदेही चाहिए
देश को अब “हादसे के बाद कार्रवाई” नहीं बल्कि “हादसे से पहले रोकथाम” की संस्कृति विकसित करनी होगी।

  • सभी स्कूलों, कोचिंग संस्थानों, होटलों और व्यावसायिक भवनों का विशेष ऑडिट हो।
  • फायर सेफ्टी उल्लंघन को आर्थिक अपराध की श्रेणी में लाने पर विचार हो।
  • संबंधित अधिकारियों की व्यक्तिगत जवाबदेही तय की जाए।
  • निरीक्षण रिपोर्टें सार्वजनिक पोर्टल पर उपलब्ध कराई जाएं।
  • नियमों के उल्लंघन पर तत्काल सीलिंग और आपराधिक कार्रवाई हो।

दिल्ली के 21 मृतक और लखनऊ के 15 मृतक केवल आंकड़े नहीं हैं। वे उस लापरवाही की कीमत हैं जिसे वर्षों से नजरअंदाज किया जाता रहा है।
जब तक सुरक्षा नियमों को कागजों से निकालकर जमीन पर लागू नहीं किया जाएगा, तब तक हर अग्निकांड के बाद मोमबत्तियां जलेंगी, श्रद्धांजलियां दी जाएंगी और फिर किसी दूसरे शहर में एक नया हादसा देश को झकझोर देगा। सवाल आग का नहीं है, सवाल उस व्यवस्था का है जो हर बार राख ठंडी होने के बाद ही जागती है।

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