Sunday, July 5, 2026
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गलत पहचान, 5 साल की जेल और आखिर में बरी… कानपुर केस ने हिला दी पुलिस जांच की नींव

कानपुर, https://dhadkannews.com : उत्तर प्रदेश के कानपुर से सामने आया एक फैसला सिर्फ एक आरोपी की रिहाई की खबर नहीं, बल्कि पुलिस की जांच प्रणाली पर गंभीर सवाल खड़े करता है। दुष्कर्म के मामले में गिरफ्तार एक युवक को करीब पांच साल जेल में बिताने पड़े, जबकि अदालत ने सभी साक्ष्यों और गवाहों के आधार पर उसे पूरी तरह निर्दोष करार देते हुए बरी कर दिया।

विशेष न्यायाधीश पॉक्सो एक्ट पवन कुमार राय ने अपने फैसले में तत्कालीन बिधनू थानाध्यक्ष विनोद कुमार सिंह और मामले की निगरानी करने वाले अधिकारियों की भूमिका पर गंभीर टिप्पणी करते हुए जांच और आवश्यक कार्रवाई के निर्देश दिए हैं।

जिसे पुलिस ने आरोपी बताया, उसे कोर्ट में कोई पहचान नहीं पाया

25 मई 2021 को बिधनू थाना क्षेत्र में 13 वर्षीय किशोरी से दुष्कर्म का मामला दर्ज हुआ था। पुलिस ने उसी दिन अमीन लायल नामक युवक को गिरफ्तार कर ‘विक्की’ बताते हुए जेल भेज दिया और उसके खिलाफ चार्जशीट भी दाखिल कर दी।

लेकिन मुकदमे की सुनवाई के दौरान पूरा मामला पलट गया। पीड़िता ने अदालत में साफ कहा कि गिरफ्तार युवक वही व्यक्ति नहीं है जिसने उसके साथ वारदात की थी। पीड़िता के पिता और मां ने भी आरोपी की पहचान करने से इनकार कर दिया। परिवार का कहना था कि असली आरोपी कोई दूसरा व्यक्ति था, जो घटना के बाद फरार हो गया था।

अदालत ने गिनाईं जांच की गंभीर खामियां

फैसले में अदालत ने कहा कि विवेचना के दौरान आरोपी की पहचान की पुष्टि नहीं कराई गई। न तो फोटो से शिनाख्त कराई गई और न ही परिजनों से सही पहचान सुनिश्चित की गई। यहां तक कि आरोपी के पहचान संबंधी दस्तावेजों की भी उचित जांच नहीं की गई। अदालत ने माना कि त्रुटिपूर्ण विवेचना के कारण एक निर्दोष व्यक्ति वर्षों तक जेल में रहा।

‘मैं कहता रहा मेरा नाम विक्की नहीं है’

जेल से रिहा हुए अमीन लायल का कहना है कि गिरफ्तारी के समय उन्होंने पुलिस को बार-बार बताया कि उनका नाम विक्की नहीं है और घटना के समय वे बनारस से लौटे थे। उनके पास यात्रा का टिकट भी था, लेकिन पुलिस ने कथित रूप से टिकट फाड़ दिया और मारपीट कर उन्हें आरोपी बना दिया। उनका दावा है कि हिरासत में हुई पिटाई से उनके कान की सुनने की क्षमता भी प्रभावित हुई।

मेडिकल रिपोर्ट भी नहीं करती थी पुष्टि

मामले की सुनवाई के दौरान मेडिकल करने वाली डॉक्टर ने भी अदालत को बताया कि मेडिकल रिपोर्ट में दुष्कर्म की पुष्टि नहीं हुई थी। रिपोर्ट में न चोट के निशान मिले और न ही अन्य ऐसे वैज्ञानिक साक्ष्य, जो आरोप की पुष्टि करते हों।

अब मुआवजे की तैयारी

बचाव पक्ष के अधिवक्ता मोहम्मद सलीम का कहना है कि पुलिस की लापरवाही के कारण एक निर्दोष युवक की जिंदगी के पांच साल जेल में बीत गए। ऐसे में वह मुआवजे का हकदार है और जल्द ही इसके लिए कानूनी प्रक्रिया शुरू की जाएगी।

यह फैसला एक बार फिर यह सवाल खड़ा करता है कि यदि जांच के शुरुआती चरण में ही पहचान और साक्ष्यों का सही सत्यापन कर लिया जाता, तो क्या एक निर्दोष व्यक्ति को अपनी जिंदगी के पांच साल जेल में बिताने पड़ते? अदालत के निर्देशों के बाद अब सबकी नजर इस बात पर है कि जांच अधिकारियों के खिलाफ वास्तव में क्या कार्रवाई होती है।

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