कानपुर/गुरुग्राम, https://dhadkannews.com : आज देशभर में विवाहित महिलाओं द्वारा “वट अमावस्या” (वट सावित्री व्रत) पूरे श्रद्धा और परंपरा के साथ मनाया जा रहा है। सुबह से ही मंदिरों और बरगद के पेड़ों के नीचे महिलाओं की भीड़ देखी गई। हाथों में पूजा की थाली, माथे पर सिंदूर और पति की लंबी उम्र की कामना के साथ महिलाएं व्रत रख रही हैं।
लेकिन सवाल सिर्फ पूजा का नहीं है… सवाल उस सोच का भी है, जहां आज भी एक महिला अपने पति की उम्र के लिए निर्जला व्रत रखती है, जबकि समाज उसकी इच्छाओं, उसके संघर्ष और उसकी सेहत पर उतना ध्यान नहीं देता।
वट सावित्री की कथा में सावित्री को एक ऐसी नारी के रूप में दिखाया गया है जिसने अपने पति सत्यवान के प्राण यमराज से वापस ले आए। यह कहानी भारतीय संस्कृति में नारी शक्ति, समर्पण और दृढ़ निश्चय का प्रतीक मानी जाती है। मगर आधुनिक दौर में यह पर्व एक नई बहस भी खड़ी करता है—क्या रिश्ते सिर्फ महिलाओं के त्याग से ही मजबूत होंगे?
आज सोशल मीडिया पर भी “वट अमावस्या” ट्रेंड कर रही है। कहीं महिलाएं पारंपरिक अंदाज में पूजा करती दिखीं, तो कहीं युवाओं ने इस पर्व को “म्यूचुअल रिस्पेक्ट” और “समान रिश्तों” से जोड़कर देखने की बात कही।
समाजशास्त्रियों का मानना है कि परंपराएं तभी मजबूत होती हैं जब वे समय के साथ संवेदनशील भी बनें। सिर्फ महिलाओं से त्याग और समर्पण की उम्मीद करने के बजाय रिश्तों में बराबरी और सम्मान की भावना भी जरूरी है। वट अमावस्या सिर्फ एक धार्मिक व्रत नहीं, बल्कि भारतीय समाज के बदलते सोच और रिश्तों की नई परिभाषा का आईना भी बनती जा रही है।



