नई दिल्ली, https://dhadkannews.com: सोमवार को जंतर-मंतर पर चली लाठियां मंगलवार को देश की राजनीति के केंद्र तक पहुंच गईं। मामला अब सिर्फ छात्रों, सोनम वांगचुक या एक प्रदर्शन तक सीमित नहीं रहा। विपक्ष ने इसे सीधे सरकार की कार्यशैली पर सवाल बनाने का मुद्दा बना दिया। प्रधानमंत्री आवास के बाहर धरना हुआ, कांग्रेस नेता राहुल गांधी और प्रियंका गांधी धरने पर बैठे, समाजवादी पार्टी प्रमुख अखिलेश यादव भी समर्थन में पहुंचे। देखते ही देखते एक छात्र आंदोलन राष्ट्रीय राजनीतिक मुद्दे में बदल गया।
यहीं से सबसे बड़ा सवाल खड़ा होता है—क्या सरकार समय रहते संवाद का रास्ता अपनाकर इस पूरे घटनाक्रम को इतना बड़ा बनने से रोक सकती थी?
जब बातचीत देर से होती है, तब राजनीति पहले पहुंच जाती है
हर आंदोलन की शुरुआत मांगों से होती है, लेकिन यदि समाधान में देरी हो जाए तो राजनीति उसकी अगुवाई करने लगती है। जंतर-मंतर में भी यही होता दिखा।
शुरुआत छात्रों की मांगों और सोनम वांगचुक के धरने से हुई थी। लेकिन लाठीचार्ज, हिरासत और टकराव के बाद विपक्ष को सरकार पर हमला करने का बड़ा राजनीतिक मुद्दा मिल गया। आज तस्वीर यह है कि मुद्दा सिर्फ छात्रों का नहीं, बल्कि संसद और प्रधानमंत्री आवास तक पहुंच चुका है।
पूरा विपक्ष छात्रों के साथ, सरकार पर तीखे हमले
जंतर-मंतर में हुए लाठीचार्ज के बाद अब लगभग पूरा विपक्ष खुलकर छात्रों के समर्थन में उतर आया है। मंगलवार को प्रधानमंत्री आवास के बाहर कांग्रेस नेता राहुल गांधी और प्रियंका गांधी के नेतृत्व में विपक्षी नेताओं ने धरना दिया। समाजवादी पार्टी प्रमुख अखिलेश यादव समेत कई अन्य विपक्षी नेताओं ने भी प्रदर्शनकारियों के प्रति एकजुटता जताई।
विपक्ष ने सरकार पर लोकतांत्रिक अधिकारों का सम्मान न करने का आरोप लगाते हुए कहा कि छात्रों की आवाज़ सुनने के बजाय उन पर लाठियां बरसाई गईं। कई विपक्षी नेताओं ने सरकार के रवैये को “कायराना” और “लोकतंत्र विरोधी” बताते हुए कहा कि यदि समय रहते संवाद किया जाता, तो स्थिति यहां तक नहीं पहुंचती।
वहीं, सरकार और सत्तापक्ष का कहना है कि संसद क्षेत्र की सुरक्षा और कानून-व्यवस्था बनाए रखना उनकी संवैधानिक जिम्मेदारी थी और पुलिस ने उसी के अनुरूप कार्रवाई की।
सरकार ने विपक्ष को मौका दिया?
राजनीति में कहा जाता है कि खाली जगह कभी खाली नहीं रहती। जहां संवाद रुकता है, वहां विपक्ष अपनी राजनीति शुरू कर देता है। यदि सरकार पहले ही दिन प्रभावी बातचीत करती और आंदोलनकारियों के साथ भरोसे का माहौल बनाती, तो शायद विपक्ष को इतना बड़ा राजनीतिक मंच नहीं मिलता। अब मामला केवल छात्र आंदोलन नहीं, बल्कि सरकार बनाम पूरा विपक्ष की सीधी राजनीतिक लड़ाई बनता दिखाई दे रहा है।
लाठियों से ज्यादा असर तस्वीरों का हुआ
जंतर-मंतर की तस्वीरों ने पूरे देश में बहस छेड़ दी। घायल छात्र, घायल पुलिसकर्मी, आंसू गैस और बैरिकेड—इन तस्वीरों ने आंदोलन को राष्ट्रीय चर्चा का विषय बना दिया। इसके अगले ही दिन प्रधानमंत्री आवास के बाहर विपक्ष का धरना इस बात का संकेत है कि मामला अब केवल प्रशासनिक नहीं, बल्कि पूरी तरह राजनीतिक हो चुका है।
सबसे बड़ा राजनीतिक सवाल
सरकार को अब केवल आंदोलनकारियों के सवालों का ही नहीं, बल्कि विपक्ष के उस नैरेटिव का भी जवाब देना होगा, जो इस पूरे घटनाक्रम को लोकतंत्र बनाम सत्ता की लड़ाई के रूप में पेश कर रहा है।
- अगर संवाद पहले होता, तो क्या प्रधानमंत्री आवास के बाहर धरना होता?
- अगर बातचीत पहले होती, तो क्या राहुल गांधी, प्रियंका गांधी, अखिलेश यादव और अन्य विपक्षी दल इस आंदोलन के समर्थन में एक मंच पर दिखाई देते?
इन सवालों के जवाब आने वाले दिनों की राजनीति तय करेंगे।
सरकार कानून-व्यवस्था बनाए रखने की अपनी जिम्मेदारी का हवाला दे सकती है और आंदोलनकारी अपनी मांगों को अनसुना किए जाने का आरोप लगा सकते हैं। लेकिन एक बात साफ दिख रही है—जब संवाद देर से शुरू होता है, तो आंदोलन सिर्फ सड़कों पर नहीं रहता, वह राष्ट्रीय राजनीति के केंद्र तक पहुंच जाता है।
जंतर-मंतर की घटना शायद इसी बात की सबसे बड़ी मिसाल बन गई है। आने वाले दिनों में यह मुद्दा संसद से लेकर सड़क तक और अधिक गर्मा सकता है।



