पुणे, https://dhadkannews.com : पुलिस की नौकरी में अक्सर ड्यूटी, अनुशासन और जिम्मेदारियों की कहानियां सामने आती हैं, लेकिन पुणे से सामने आया एक मामला इन सबसे अलग है। यहां दो महिला कांस्टेबल्स की दोस्ती धीरे-धीरे इतनी गहरी हुई कि दोनों ने एक-दूसरे के साथ जिंदगी बिताने का फैसला कर लिया। शादी की तारीख तय हुई, निमंत्रण बांटे गए और आलंदी में वैदिक रीति-रिवाजों से विवाह की तैयारियां भी शुरू हो गईं। लेकिन अब यह शादी रद्द हो चुकी है।
कहानी की शुरुआत करीब तीन साल पहले पुलिस भर्ती प्रक्रिया के दौरान हुई थी। दोनों महिलाएं इसी प्रक्रिया के दौरान एक-दूसरे के संपर्क में आईं। भर्ती पूरी हुई तो दोनों की नियुक्ति महिला पुलिस कांस्टेबल के तौर पर हुई।
ट्रेनिंग से शुरू हुआ साथ, फिर बढ़ती गई नजदीकी
पुलिस ट्रेनिंग के दौरान दोनों की दोस्ती और मजबूत हुई। ट्रेनिंग पूरी होने के बाद जब दोनों को पुणे के पिंपरी-चिंचवड़ पुलिस विभाग के एक ही पुलिस स्टेशन में तैनाती मिली, तो साथ काम करने और समय बिताने का सिलसिला जारी रहा।
धीरे-धीरे यह दोस्ती एक ऐसे रिश्ते में बदल गई, जिसे दोनों ने अपनी जिंदगी का हिस्सा बनाने का फैसला किया। दोनों साथ रहने लगीं और बाद में पारंपरिक तरीके से विवाह करने की योजना बनाई। यानी मामला सिर्फ दोस्ती तक सीमित नहीं रहा—दोनों ने अपने रिश्ते को सामाजिक और पारंपरिक विवाह के रूप में आगे बढ़ाने की कोशिश की।
30 अगस्त को आलंदी में होनी थी शादी
दोनों ने 30 अगस्त को आलंदी में वैदिक रीति-रिवाजों के अनुसार विवाह करने की योजना बनाई थी। शादी को लेकर तैयारियां चल रही थीं और पुलिस विभाग में छुट्टी के लिए आवेदन भी दिया गया था। बताया जा रहा है कि शादी का निमंत्रण भी संबंधित अधिकारियों को सौंपा गया था।
लेकिन इसी बीच परिवार की तरफ से विरोध सामने आया। परिवार के विरोध के बाद मामला बदल गया और आखिरकार प्रस्तावित शादी को रद्द कर दिया गया।
पुलिस ने कहा—यह उनका निजी मामला
मामले की जानकारी पुलिस अधिकारियों तक पहुंचने के बाद विभाग ने इसे दोनों महिलाओं का निजी मामला माना। अधिकारियों की भूमिका फिलहाल किसी तरह का हस्तक्षेप करने के बजाय जरूरत पड़ने पर काउंसलिंग उपलब्ध कराने तक सीमित बताई जा रही है।
यह पहलू इसलिए भी महत्वपूर्ण है क्योंकि दोनों महिलाएं पुलिस विभाग में कार्यरत हैं और उनका निजी रिश्ता अब सार्वजनिक चर्चा का विषय बन गया है।
एक महिला ने जेंडर ट्रांजिशन के लिए शुरू कराया इलाज
इस मामले का एक और पहलू भी सामने आया है। उपलब्ध खबरों के अनुसार, दोनों में से एक महिला ने जेंडर ट्रांजिशन के लिए मेडिकल प्रक्रिया शुरू कराने की दिशा में कदम उठाया था और इसके लिए मुंबई के एक अस्पताल में चिकित्सा परामर्श लेने की बात सामने आई है।
हालांकि, इस संबंध में किसी भी मेडिकल विवरण को सार्वजनिक रूप से जोड़ना उचित नहीं होगा, क्योंकि यह संबंधित व्यक्ति की निजी स्वास्थ्य और पहचान से जुड़ी जानकारी है।
कानून क्या कहता है?
भारत में वयस्कों के बीच आपसी सहमति से समलैंगिक संबंध अपराध नहीं हैं। सुप्रीम कोर्ट ने भी निजता, गरिमा और व्यक्तिगत पसंद के अधिकारों को व्यापक संवैधानिक संरक्षण दिया है।
हालांकि, भारत में समान-लिंग विवाह को वर्तमान कानून के तहत वैधानिक विवाह का दर्जा प्राप्त नहीं है। इसलिए दो महिलाओं द्वारा पारंपरिक वैदिक रीति-रिवाजों से विवाह करने की योजना और उस विवाह की कानूनी मान्यता—दो अलग-अलग सवाल हैं। यही वजह है कि पुणे का यह मामला केवल एक शादी के रद्द होने की कहानी नहीं है। इसके पीछे व्यक्तिगत पसंद, परिवार की स्वीकार्यता, सामाजिक सोच और भारतीय कानून के बीच मौजूद जटिल सवाल भी जुड़े हैं।
मंडप तक पहुंचने से पहले रुक गई कहानी
पुलिस ट्रेनिंग के दौरान शुरू हुई दोस्ती ने तीन साल में ऐसा मोड़ लिया कि दोनों ने साथ जिंदगी बिताने का फैसला कर लिया। शादी की तारीख तय हुई, आलंदी में वैदिक विवाह की तैयारी हुई और निमंत्रण तक पहुंच गए।
लेकिन परिवार के विरोध के बाद वह रिश्ता अब शादी के मंडप तक नहीं पहुंच सका। फिलहाल दोनों महिला कांस्टेबल्स अपने-अपने निजी फैसलों और परिस्थितियों के बीच हैं। इस पूरे मामले ने एक बार फिर यह सवाल जरूर खड़ा कर दिया है कि कानून जब निजी रिश्तों की सीमाएं तय करता है और समाज जब उन रिश्तों की स्वीकार्यता तय करता है, तो सबसे ज्यादा दबाव आखिर किस पर पड़ता है—रिश्ते पर या उसे जीने वाले इंसान पर?



