निर्विघ्न सिंह
अयोध्या/लखनऊ https://dhadkannews.com :राम मंदिर केवल एक मंदिर नहीं है। यह करोड़ों लोगों की आस्था, दशकों के संघर्ष और राष्ट्रीय भावनाओं का प्रतीक है। इसलिए जब यहां दान, आभूषणों या कथित वित्तीय अनियमितताओं को लेकर सवाल उठते हैं, तो मामला किसी सामान्य चोरी से कहीं बड़ा हो जाता है।
लेकिन इस पूरे विवाद में सबसे हैरान करने वाली बात कथित चोरी के आरोप नहीं हैं। सबसे बड़ा सवाल यह है कि जिस मामले में SIT जांच कर रही है, उसमें अब तक FIR क्यों नहीं हुई? यही वह बिंदु है जहां यह मामला कथित चोरी से निकलकर जवाबदेही, पारदर्शिता और कार्रवाई की नीयत की बहस में बदल जाता है।
अगर कुछ हुआ ही नहीं, तो SIT क्यों?
सरकार और प्रशासन का यह कदम कि मामले की जांच के लिए SIT गठित की जाए, अपने आप में यह संकेत देता है कि आरोपों को गंभीरता से लिया गया है। क्योंकि SIT किसी अफवाह या सोशल मीडिया पोस्ट के लिए नहीं बनाई जाती। लेकिन यहीं से दूसरा सवाल जन्म लेता है—
अगर आरोप इतने गंभीर हैं कि SIT की जरूरत पड़ गई, तो FIR दर्ज करने में संकोच क्यों?
यानी सरकार और जांच एजेंसियां जनता से यह तो कह रही हैं कि मामला जांच लायक है, लेकिन अभी तक यह नहीं बता पा रही हैं कि मामला मुकदमा दर्ज करने लायक है या नहीं।
क्या राम मंदिर में कानून की प्रक्रिया अलग है?
देश में किसी आम नागरिक के घर से गहने या नकदी गायब होने की शिकायत मिले तो पुलिस का पहला कदम क्या होता है? FIR। जांच उसके बाद शुरू होती है। लेकिन राम मंदिर विवाद में तस्वीर उलटी दिखाई दे रही है। यहां पहले जांच चल रही है, FIR बाद की बात बन गई है। कानूनी विशेषज्ञों का कहना है कि यदि किसी संज्ञेय अपराध की आशंका है तो FIR दर्ज होना सामान्य प्रक्रिया का हिस्सा है। यही वजह है कि अब सवाल उठ रहे हैं कि— क्या यहां प्रक्रिया को परिस्थितियों के हिसाब से ढाला जा रहा है?
आस्था को चोट आरोपों से नहीं, अस्पष्टता से लगती है
राम मंदिर के करोड़ों श्रद्धालु यह नहीं चाहते कि किसी को बिना सबूत दोषी ठहराया जाए।
लेकिन वे यह जरूर जानना चाहते हैं कि—
- आखिर जांच किस आधार पर शुरू हुई?
- क्या किसी ने औपचारिक शिकायत दी?
- क्या कोई प्राथमिक तथ्य सामने आए?
- और सबसे महत्वपूर्ण—क्या दोषियों तक पहुंचने की इच्छा भी उतनी ही मजबूत है जितनी जांच शुरू करने की?
इन सवालों का स्पष्ट जवाब अभी तक सार्वजनिक रूप से सामने नहीं आया है।
क्या जांच और कार्रवाई के बीच कोई अदृश्य दीवार खड़ी है?
भारतीय राजनीति और प्रशासन में जनता ने कई बार ऐसे मामले देखे हैं जहां जांच की घोषणा खूब हुई, लेकिन नतीजे धुंध में खो गए।
यही कारण है कि राम मंदिर विवाद में भी लोग पूछ रहे हैं—क्या यह जांच सच तक पहुंचेगी या सिर्फ विवाद को ठंडा करने का माध्यम बनेगी? यह सवाल इसलिए भी महत्वपूर्ण है क्योंकि मामला किसी सरकारी दफ्तर का नहीं, बल्कि देश की सबसे बड़ी धार्मिक आस्थाओं में से एक का है।
सवाल सिर्फ पैसे का नहीं, भरोसे का है
राम मंदिर में दान देने वाला व्यक्ति रसीद से ज्यादा विश्वास पर भरोसा करता है। वह यह मानकर दान करता है कि उसका योगदान भगवान के चरणों तक पहुंचेगा और उसका उपयोग पारदर्शी तरीके से होगा। इसलिए यहां एक रुपये की गड़बड़ी का आरोप भी करोड़ों लोगों के विश्वास से जुड़ जाता है। और जब विश्वास से जुड़ा मामला हो, तो आधी जानकारी और अधूरी कार्रवाई सबसे ज्यादा संदेह पैदा करती है।
सबसे असहज सवाल: FIR से डर किस बात का है?
यदि आरोप निराधार हैं तो FIR दर्ज कर निष्पक्ष जांच के जरिए सच्चाई सामने लाई जानी चाहिए। यदि आरोप सही हैं तो FIR दर्ज कर दोषियों तक पहुंचना चाहिए।दोनों ही परिस्थितियों में FIR न्यायिक प्रक्रिया का स्वाभाविक हिस्सा बनती है। फिर सवाल यह है कि—SIT की रफ्तार दिख रही है, लेकिन FIR की दिशा क्यों नहीं?
राम मंदिर को जांच नहीं, निर्विवाद सच चाहिए
राम मंदिर किसी राजनीतिक दल, सरकार या ट्रस्ट की संपत्ति नहीं है। यह करोड़ों लोगों की आस्था का केंद्र है।इसीलिए इस मामले में सिर्फ जांच शुरू कर देना पर्याप्त नहीं होगा। लोग यह भी देखना चाहेंगे कि—क्या जांच का अंत जवाबदेही पर होगा, या सिर्फ एक रिपोर्ट पर?क्योंकि इस पूरे विवाद में सबसे बड़ा मुद्दा कथित चोरी नहीं है।सबसे बड़ा मुद्दा है—क्या आस्था के सबसे बड़े केंद्र में जवाबदेही भी उतनी ही बड़ी है?



