नई दिल्ली, https://dhadkannews.com : देश की आर्थिक राजधानी मुंबई, जहां समुद्र की खुली हवाओं को कभी प्रदूषण से राहत का प्राकृतिक सहारा माना जाता था, अब जहरीली हवा और धुंध की चुनौती से जूझ रही है। दूसरी ओर, प्रदूषण के लिए अक्सर चर्चा में रहने वाली दिल्ली की हवा ने अक्टूबर में अपेक्षाकृत राहत भरी तस्वीर पेश की है। 24 अक्टूबर के सामने आए आंकड़ों ने दोनों महानगरों के बीच प्रदूषण की एक चौंकाने वाली तुलना खड़ी कर दी है।
केंद्रीय प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड (CPCB) के आंकड़ों के मुताबिक, 24 अक्टूबर को मुंबई का वायु गुणवत्ता सूचकांक (AQI) 322 दर्ज किया गया, जबकि दिल्ली का AQI 176 रहा। भारतीय AQI मानकों के अनुसार, मुंबई की हवा ‘बेहद खराब’ और दिल्ली की हवा ‘मध्यम’ श्रेणी में थी। दिल्ली के लिए यह 24 अक्टूबर का पिछले एक दशक में सबसे बेहतर स्तर बताया गया है। हालांकि, एक दिन के आंकड़ों से पूरे महीने या लंबे समय की वायु गुणवत्ता का निष्कर्ष निकालना उचित नहीं होगा।
मुंबई की हवा में जहर घोल रहे धूल और धुएं के कण
मुंबई की बिगड़ती हवा के पीछे किसी एक कारण को जिम्मेदार नहीं ठहराया जा सकता। सड़कों पर उड़ती धूल, वाहनों से निकलने वाला धुआं, औद्योगिक गतिविधियां और तेजी से चल रहे निर्माण कार्य मिलकर प्रदूषण का दबाव बढ़ा रहे हैं। इसके साथ ही, हवा की रफ्तार कम होने पर प्रदूषक कण वातावरण में जमा रह सकते हैं, जिससे धुंध और प्रदूषण की समस्या गंभीर हो जाती है।
महानगर में सड़क निर्माण, मेट्रो और दूसरी बुनियादी ढांचा परियोजनाओं के चलते कई इलाकों में धूल नियंत्रण एक बड़ी चुनौती है। सड़कों पर जमा मिट्टी, निर्माण सामग्री और मलबा वाहनों की आवाजाही के साथ दोबारा हवा में फैल सकता है। ट्रैफिक जाम की स्थिति में वाहनों का उत्सर्जन भी स्थानीय प्रदूषण को बढ़ा सकता है।
सवाल सिर्फ इतना नहीं है कि मुंबई की हवा खराब क्यों हुई, बल्कि यह भी है कि प्रदूषण रोकने के लिए बनाए गए नियम जमीन पर कितनी प्रभावी तरीके से लागू हो रहे हैं।
समुद्र किनारे बसा शहर, फिर भी स्मॉग से राहत क्यों नहीं?
मुंबई की भौगोलिक स्थिति उसे समुद्री हवाओं का लाभ देती है, लेकिन इसका मतलब यह नहीं कि शहर प्रदूषण से सुरक्षित है। हवा की गति, दिशा, नमी और वातावरण में मौजूद कणों की प्रकृति वायु गुणवत्ता को प्रभावित कर सकती है।
बृहन्मुंबई महानगरपालिका (BMC) की ओर से समुद्री नमक के कणों को भी धुंध के संभावित कारणों में शामिल किया गया है। हालांकि, समुद्री नमक को ही खराब हवा की मुख्य वजह मानना सही नहीं होगा। वाहनों, उद्योगों, निर्माण गतिविधियों और सड़क की धूल से पैदा होने वाले प्रदूषकों की भूमिका की भी जांच जरूरी है।
समुद्र के करीब होना अपने आप में स्वच्छ हवा की गारंटी नहीं है। असली सवाल यह है कि प्रदूषण के स्रोतों पर कितना नियंत्रण है और मौसम की प्रतिकूल परिस्थितियों में शहर की हवा कितनी तेजी से साफ हो पाती है।
PM10 प्रदूषण में परिवहन और सड़क की धूल की बड़ी हिस्सेदारी
मुंबई में PM10 प्रदूषण के स्रोतों पर आधारित वर्ष 2020 के एक अध्ययन में परिवहन का योगदान 19.6 प्रतिशत, सड़क की धूल का 19.4 प्रतिशत और औद्योगिक गतिविधियों का 18.9 प्रतिशत बताया गया था।
ये आंकड़े पुराने अध्ययन पर आधारित हैं और इन्हें अक्टूबर 2026 के किसी एक दिन के प्रदूषण का प्रत्यक्ष विभाजन नहीं माना जाना चाहिए। फिर भी, वे यह समझने में मदद करते हैं कि महानगर की वायु गुणवत्ता सुधारने के लिए केवल एक उपाय पर्याप्त नहीं होगा।
सड़कों की नियमित सफाई, निर्माण स्थलों पर धूल नियंत्रण, निर्माण सामग्री को ढककर रखना, वाहनों के उत्सर्जन पर निगरानी और औद्योगिक प्रदूषण के नियमों का सख्ती से पालन जरूरी है। इसके साथ ही, कचरा खुले में जलाने जैसी गतिविधियों पर प्रभावी रोक भी महत्वपूर्ण है।
दिल्ली को राहत, लेकिन खतरा अभी खत्म नहीं
दिल्ली का AQI 176 रहना मुंबई के 322 के मुकाबले बेहतर स्थिति जरूर दिखाता है, लेकिन इसे स्वच्छ हवा का प्रमाण नहीं समझना चाहिए। CPCB के अनुसार, 101 से 200 के बीच का AQI ‘मध्यम’ श्रेणी में आता है। इस स्तर पर भी बच्चों, बुजुर्गों और अस्थमा या हृदय संबंधी समस्याओं से जूझ रहे लोगों को लंबे समय तक प्रदूषित वातावरण में रहने से परेशानी हो सकती है।
दिल्ली की बेहतर स्थिति से यह संकेत मिलता है कि प्रदूषण की तस्वीर मौसम, स्थानीय उत्सर्जन और नियंत्रण उपायों के साथ बदल सकती है। हालांकि, इस एक दिन के आंकड़े के आधार पर किसी विशेष सरकारी कदम को सुधार का एकमात्र कारण बताना उचित नहीं होगा।
प्रशासन के सामने सबसे बड़ा सवाल: घोषणा या जमीन पर कार्रवाई?
मुंबई में प्रदूषण नियंत्रण के लिए उपायों की घोषणा तभी असरदार साबित होगी, जब उनकी नियमित निगरानी हो और नियम तोड़ने वालों पर कार्रवाई की जाए। निर्माण स्थलों पर धूल नियंत्रण, सड़कों से मिट्टी हटाने, वाहनों के उत्सर्जन की जांच और प्रदूषण फैलाने वाली औद्योगिक गतिविधियों पर निगरानी को प्राथमिकता देनी होगी।
प्रदूषण की समस्या केवल आंकड़ों या धुंध की तस्वीरों तक सीमित नहीं है। इसका सीधा संबंध लोगों की सेहत, सार्वजनिक स्वास्थ्य व्यवस्था और शहर में रहने की गुणवत्ता से है।
CPCB के मानकों के मुताबिक, 301 से 400 के बीच AQI ‘बेहद खराब’ श्रेणी में आता है, जिसमें लंबे समय तक संपर्क रहने पर सांस संबंधी बीमारियों का जोखिम बढ़ सकता है। इसलिए मुंबई में दर्ज 322 का स्तर स्वास्थ्य के लिहाज से गंभीर चिंता का विषय है।
अक्टूबर के आखिरी सप्ताह में सामने आई यह तुलना एक बड़ा संदेश देती है—किसी शहर की पहचान, समुद्र की मौजूदगी या विकास की रफ्तार उसकी हवा को साफ रखने की गारंटी नहीं है। मुंबई के लिए चुनौती प्रदूषण के स्रोतों पर प्रभावी नियंत्रण की है, जबकि दिल्ली के लिए मिली राहत को बनाए रखना जरूरी है। आखिरकार, शहरों की असली तरक्की का पैमाना सिर्फ ऊंची इमारतें और तेज रफ्तार सड़कें नहीं, बल्कि वह हवा भी है जिसमें उनके नागरिक हर दिन सांस लेते हैं।



