लखनऊ, https://dhadkannews.com : जिस घर में 25 नवंबर को शादी की शहनाइयां बजने की तैयारी थी, वहां अब मातम, नाराजगी और बिछड़ने की कहानी है। बेटी की शादी को लेकर परिवार ने सपने संजोए थे, लेकिन 15 अक्टूबर को उसके घर छोड़ने की घटना ने परिवार की जिंदगी में ऐसा मोड़ ला दिया, जिसका दर्द अब एक असाधारण फैसले के रूप में सामने आया है। उत्तर प्रदेश के कौशांबी में एक पिता ने अपनी दिवंगत पत्नी के साथ जीवित बेटी का भी पिंडदान कर तेरहवीं संस्कार कर दिया। साथ ही, बेटी को अपनी चल-अचल संपत्ति से बेदखल करने का फैसला लेने की बात भी सामने आई है।
यह मामला कौशांबी के मूरतगंज-पल्हाना रोड निवासी राजू गुप्ता के परिवार से जुड़ा बताया जा रहा है। घटना ने रिश्तों, पारिवारिक अपेक्षाओं और व्यक्तिगत फैसलों के बीच पैदा होने वाले टकराव पर नई बहस छेड़ दी है।
कॉलेज गई बेटी नहीं लौटी, तलाश में सामने आई प्रेम कहानी
मिली जानकारी के मुताबिक, राजू गुप्ता की इकलौती बेटी ज्योति गुप्ता 15 अक्टूबर को कॉलेज गई थी, लेकिन घर वापस नहीं लौटी। परिवार ने तलाश शुरू की तो पता चला कि वह धन्नी गांव निवासी अमरदीप रैदास के साथ चली गई है, जिसे उसका प्रेमी बताया जा रहा है।
परिवार के लिए यह घटना अप्रत्याशित थी। घर में शादी से जुड़ी तैयारियों और भविष्य की योजनाओं के बीच बेटी के इस कदम ने परिजनों को गहरे सदमे में डाल दिया।
बेटी के जाने का सदमा, मां की मौत से टूटा परिवार
इस घटना के बाद परिवार पर एक और दुखद खबर आने की बात सामने आई। रिपोर्टों के अनुसार, बेटी के घर छोड़ने से आहत उसकी मां पार्वती गुप्ता की मौत हो गई। बेटी के जाने और पत्नी को खोने के दोहरे दुख ने राजू गुप्ता को गहरे संकट में डाल दिया।
इस पूरे घटनाक्रम में सबसे संवेदनशील पहलू यह बताया गया कि मां की मौत की सूचना मिलने के बाद भी ज्योति अंतिम संस्कार में शामिल नहीं हुई। हालांकि, इस फैसले के पीछे उनकी परिस्थितियों और पक्ष को समझे बिना किसी निष्कर्ष पर पहुंचना उचित नहीं होगा।
पुलिस की पूछताछ, अदालत में बयान… फिर प्रेमी के साथ चली गई बेटी
बताया जाता है कि पुलिस ने ज्योति और उसके प्रेमी को हिरासत में लेकर पूछताछ की। ज्योति के बालिग होने के कारण उसका बयान अदालत में दर्ज कराया गया, जिसके बाद उसे अपने प्रेमी के साथ जाने दिया गया।
इस घटनाक्रम से जुड़े कानूनी पहलुओं और दोनों पक्षों के विस्तृत बयान स्वतंत्र रूप से सत्यापित किए जाने आवश्यक हैं।
जीवित बेटी का पिंडदान, संपत्ति से बेदखली का फैसला
पत्नी की मौत के बाद राजू गुप्ता ने अपनी दिवंगत पत्नी के साथ जीवित बेटी का भी पिंडदान कर तेरहवीं संस्कार कर दिया। यह कदम परिवार के भीतर पैदा हुए गहरे भावनात्मक टूटाव को दर्शाता है।
इसके साथ ही, पिता द्वारा बेटी को अपनी चल-अचल संपत्ति से बेदखल करने का फैसला लेने की बात भी सामने आई है। हालांकि, संपत्ति से बेदखली के इस कथित फैसले की कानूनी स्थिति अलग विषय है और केवल घोषणा से संपत्ति पर अधिकार स्वतः समाप्त नहीं हो जाते।
एक घटना, कई सवाल: रिश्तों में फैसले की कीमत कौन चुकाता है?
कौशांबी का यह मामला केवल प्रेम प्रसंग या पिता की नाराजगी तक सीमित नहीं है। इसके केंद्र में एक परिवार का बिखरना, मां की मौत, पिता का दुख और एक बालिग बेटी का अपना जीवन चुनने का फैसला है।
एक ओर माता-पिता अपनी संतान के भविष्य को लेकर उम्मीदें और सपने संजोते हैं, तो दूसरी ओर बालिग व्यक्ति को अपने जीवन और साथी के बारे में निर्णय लेने का अधिकार भी है। ऐसे मामलों में भावनात्मक आघात को समझना जितना जरूरी है, उतना ही जरूरी है कि किसी व्यक्ति के फैसले के आधार पर उसके पूरे पक्ष को सुने बिना उसे दोषी न ठहराया जाए।
आखिर सवाल यह है कि जब परिवारों में उम्मीदें और व्यक्तिगत फैसले आमने-सामने आ जाते हैं, तो टूटते रिश्तों को संभालने का रास्ता कौन तलाशेगा? कौशांबी की यह घटना इसी सवाल को फिर सामने लाती है।



