निर्विघ्न सिंह
नई दिल्ली, https://dhadkannews.com/ : राजधानी दिल्ली के मालवीय नगर में स्थित होटल फ्लरिश स्टे में लगी भीषण आग ने सिर्फ 21 लोगों की जान नहीं ली, बल्कि उस खौफनाक सिस्टम को भी बेनकाब कर दिया जो सालों से कागजों पर सुरक्षा और जमीन पर मौत बेच रहा है। बुधवार सुबह हुए इस दर्दनाक अग्निकांड के बाद दिल्ली पुलिस ने होटल मालिक लवकेश बजाज को गिरफ्तार कर लिया है। उसकी और उसकी पत्नी के खिलाफ पहले ही लुकआउट सर्कुलर (LOC) जारी किया गया था ताकि वे देश छोड़कर फरार न हो सकें।
लेकिन सवाल सिर्फ एक होटल मालिक का नहीं है। सवाल उस पूरे सिस्टम का है जहाँ फायर सेफ्टी, हाइजिन, पेस्ट कंट्रोल और बिल्डिंग नियम सिर्फ “औपचारिकताएं” बनकर रह गए हैं। जहाँ इंसानी जान से ज्यादा महत्व “कम खर्च और ज्यादा कमाई” को दिया जा रहा है।
सुबह 8:40 बजे शुरू हुआ था मौत का तांडव
बुधवार सुबह करीब 8 बजकर 40 मिनट पर होटल के ग्राउंड फ्लोर पर बने रेस्टोरेंट “स्नैक एंड बाइट्स” से आग भड़की। कुछ ही मिनटों में आग और धुआं पूरी बिल्डिंग में फैल गया। संकरी गलियों में बना होटल देखते ही देखते मौत का जाल बन चुका था। उस वक्त होटल के अंदर करीब 60 लोग मौजूद थे। इनमें मरीज, उनके परिजन और बड़ी संख्या में विदेशी नागरिक शामिल थे। चीख-पुकार, धुएं और आग की लपटों के बीच लोगों को समझ नहीं आ रहा था कि वे भागें तो कहाँ भागें।
तीसरी मंजिल से कूदते लोग, नीचे बिछे गद्दे
घटना इतनी भयावह थी कि लोगों ने जान बचाने के लिए तीसरी मंजिल से छलांग लगानी शुरू कर दी। स्थानीय लोगों ने नीचे गद्दे और चादरें बिछाईं। एक महिला अपनी मासूम बच्ची को सीने से लगाकर ऊपर से कूद गई। दोनों की जान बच गई, लेकिन महिला गंभीर रूप से घायल हो गई और उसका पैर टूट गया। मौके पर मौजूद लोगों का कहना था कि अगर कुछ मिनट और देरी होती तो मरने वालों की संख्या और बढ़ सकती थी।
बेसमेंट में मौत बंद थी ताले के पीछे
रेस्क्यू टीम जब बेसमेंट तक पहुंची तो सामने ऐसा सच आया जिसने सभी को झकझोर दिया। बेसमेंट से बाहर निकलने का सिर्फ एक रास्ता था और उस पर लोहे की ग्रिल के साथ ताला लगा हुआ था। फायर ब्रिगेड कर्मचारियों को गैस कटर से ग्रिल काटनी पड़ी, तब जाकर लोगों को बाहर निकाला जा सका। यह सिर्फ लापरवाही नहीं थी, बल्कि सीधे तौर पर मौत को कैद करने जैसा अपराध था।
11 विदेशी नागरिकों समेत 21 मौतें
इस अग्निकांड में कुल 21 लोगों की मौत हुई है, जिनमें 11 विदेशी नागरिक शामिल हैं। 21 विदेशी नागरिक घायल बताए जा रहे हैं, जिनमें से 10 की हालत गंभीर है और वे वेंटिलेटर पर हैं। इसके अलावा 14 भारतीय नागरिक भी घायल हुए हैं। दिल्ली पुलिस ने होटल मालिक और अन्य जिम्मेदार लोगों के खिलाफ गैरइरादतन हत्या समेत कई गंभीर धाराओं में मामला दर्ज किया है।
सरकार हरकत में, लेकिन क्या सिस्टम बदलेगा?
दिल्ली की मुख्यमंत्री रेखा गुप्ता ने घटना पर दुख जताते हुए मजिस्ट्रेट जांच के आदेश दिए हैं। वहीं दिल्ली के उपराज्यपाल ने आपात समीक्षा बैठक कर 4 जून से राजधानी में एक महीने का विशेष फायर सेफ्टी अभियान चलाने का ऐलान किया है। इस अभियान के तहत होटल, गेस्ट हाउस, नर्सिंग होम और कोचिंग सेंटरों की जांच की जाएगी। नियमों का उल्लंघन पाए जाने पर सीलिंग जैसी सख्त कार्रवाई की बात कही गई है। लेकिन दिल्ली का आम आदमी पूछ रहा है — क्या यह अभियान भी कुछ दिनों का दिखावा बनकर रह जाएगा?
यह सिर्फ फायर सेफ्टी की नहीं, पूरे सिस्टम की बीमारी है
मालवीय नगर अग्निकांड ने सिर्फ एक होटल की पोल नहीं खोली। इसने उस खतरनाक गठजोड़ को सामने ला दिया है जिसमें होटल मालिक, ठेकेदार, लोकल एजेंसियां और कई जिम्मेदार विभाग शामिल दिखाई देते हैं।
राजधानी में ऐसे सैकड़ों होटल, हॉस्पिटल और गेस्ट हाउस हैं जहाँ:
- फायर एग्जिट सिर्फ नक्शों में मौजूद हैं
- बेसमेंट अवैध रूप से इस्तेमाल किए जा रहे हैं
- हाइजिन नाम की चीज नहीं है
- पेस्ट कंट्रोल सिर्फ खानापूर्ति बन चुका है
- सस्ती और बिना तकनीकी ज्ञान वाली एजेंसियों को कॉन्ट्रैक्ट दिए जाते हैं
- नियमों से ज्यादा “रेट” मायने रखता है
पेस्ट कंट्रोल भी बना जान से खिलवाड़ का कारोबार
होटल और हॉस्पिटल जैसे संवेदनशील संस्थानों में पेस्ट कंट्रोल सीधे लोगों के स्वास्थ्य और सुरक्षा से जुड़ा मामला है, लेकिन इसे भी सिर्फ “सबसे कम रेट” पर निपटाया जा रहा है। कई संस्थान बिना लाइसेंस और बिना तकनीकी विशेषज्ञता वाली लोकल कंपनियों को कॉन्ट्रैक्ट दे रहे हैं। कहीं अनाधिकृत केमिकल्स का इस्तेमाल हो रहा है, तो कहीं सस्ते एग्रीकल्चर केमिकल इंसानी वातावरण में छिड़के जा रहे हैं।
कई मामलों में यह भी सामने आया है कि चूहों द्वारा इलेक्ट्रिक केबल और वायर कुतरने से शॉर्ट सर्किट हुआ, जो आग लगने की बड़ी वजह बना। इसके बावजूद न संस्थानों को चिंता है, न लाइसेंस देने वालों को और न ही उन एजेंसियों को जो सिर्फ पैसा कमाने की दौड़ में शामिल हैं। मरीजों, बच्चों और बुजुर्गों की सुरक्षा लगातार दांव पर लगी हुई है।
हादसे अचानक नहीं होते, तैयार किए जाते हैं
सच्चाई यह है कि ऐसी घटनाएं अचानक नहीं होतीं। इन्हें धीरे-धीरे तैयार किया जाता है —
- जब फायर ऑडिट सिर्फ फाइलों में सीमित रह जाए
- जब निरीक्षण रिश्वत के नीचे दब जाए
- जब सुरक्षा की जगह मुनाफा प्राथमिकता बन जाए
- जब नियम सिर्फ दिखावे के लिए बचें
- और जब जिम्मेदार विभाग आंखें बंद कर लें
मालवीय नगर की आग ने सिर्फ 21 जिंदगियां नहीं लीं, बल्कि उस व्यवस्था की सच्चाई सामने रख दी जहाँ हर दूसरा संस्थान “जुगाड़” पर और हर तीसरा व्यक्ति “सेटिंग” पर चल रहा है।
कुछ दिन शोर होगा… फिर सब सामान्य?
हर बड़े हादसे के बाद जांच बैठती है। बयान आते हैं। अभियान चलते हैं। कुछ अधिकारियों पर कार्रवाई होती है। लेकिन कुछ हफ्तों बाद वही अवैध निर्माण, वही बंद फायर एग्जिट, वही नकली अनुपालन और वही मौत से खिलवाड़ फिर शुरू हो जाता है।
मालवीय नगर अग्निकांड सिर्फ आग नहीं थी — यह लालच, लापरवाही और भ्रष्ट व्यवस्था की वह लपट थी जिसने 21 जिंदगियों को निगल लिया।
अब देखने वाली बात यह है कि इस बार सिस्टम सच में बदलेगा… या अगली त्रासदी तक फिर सबकुछ फाइलों में दफन कर दिया जाएगा।
(लेखक एक वरिष्ठ स्वतंत्र पत्रकार हैं)



