Monday, March 2, 2026
spot_img
Homeबड़ी ख़बर“अलीगढ़ से वर्ल्ड कप तक… और बीच में एक पिता की खामोश...

“अलीगढ़ से वर्ल्ड कप तक… और बीच में एक पिता की खामोश विदाई”

'Sixer King रिंकू' के पिता खांचंद सिंह का निधन

लखनऊ/अलीगढ़, संवाददाता https://dhadkannews.com: स्टेडियम में हजारों लोग शोर कर रहे थे। कैमरे चमक रहे थे। कमेंट्री बॉक्स में नाम गूंज रहा था — रिंकू सिंह। लेकिन उसी वक्त, अलीगढ़ की एक साधारण-सी गली में सन्नाटा था।
वह घर, जहां कभी क्रिकेट की गेंद की आवाज़ दीवारों से टकराती थी, अब शोक में डूबा था। घर के आंगन में खामोशी थी — क्योंकि उस घर का सबसे मजबूत स्तंभ, खांचंद सिंह, अब नहीं रहे। यह सिर्फ एक निधन की खबर नहीं। यह उस पिता की कहानी है, जिसने कंधों पर सिलेंडर ढोते-ढोते अपने बेटे के सपनों को वजन देना सिखाया।

गरीब घर का सपना: जहां क्रिकेट ‘शौक’ नहीं, जोखिम था
अलीगढ़ की तंग गलियों में पले-बढ़े रिंकू के लिए क्रिकेट मैदान तक पहुंचना किसी सुविधा का नतीजा नहीं था।
दो कमरों के सरकारी क्वार्टर में बड़ा परिवार। सीमित आय। हर महीने का हिसाब तंग।
खांचंद सिंह एलपीजी सिलेंडर डिलीवरी का काम करते थे। सुबह से शाम तक कंधों पर 30-35 किलो का बोझ उठाना — यही उनकी दिनचर्या थी।
उन्हें डर था कि क्रिकेट कहीं बेटे का भविष्य न बिगाड़ दे।
कई बार उन्होंने डांटा, रोका, यहां तक कि सख्ती भी की।
पर वह सख्ती दरअसल असुरक्षा थी — एक पिता का डर, जो गरीबी में पला हो।

वह दिन जिसने कहानी बदल दी
एक स्कूल टूर्नामेंट। एक इनाम — मोटरसाइकिल।
जब रिंकू ने वह बाइक जीतकर अपने पिता को सौंप दी, तो खांचंद सिंह के भीतर कुछ बदल गया। उन्होंने पहली बार महसूस किया — यह जिद नहीं, प्रतिभा है।
उस दिन से वे सिर्फ पिता नहीं रहे, वे साथी बन गए।
सिलेंडर ढोने वाले वही हाथ अब बेटे के किट-बैग उठाने लगे।

आईपीएल की रात और अलीगढ़ की सुबह
जब Indian Premier League में रिंकू ने लगातार छक्के लगाकर मैच जिताया, तो देश ने एक नया फिनिशर देखा। लेकिन अलीगढ़ के उस छोटे घर में लोगों ने सिर्फ एक चीज देखी — “हमारा बेटा टीवी पर है।”
उस रात खांचंद सिंह की आंखों में गर्व था। सालों की मेहनत, समाज की बातें, आर्थिक तंगी — सब कुछ जैसे उस एक पल में धुल गया।

वर्ल्ड कप के बीच जीवन का असली इम्तिहान
क्रिकेटर के लिए ICC Men’s T20 World Cup सिर्फ टूर्नामेंट नहीं, सपना होता है। देश की उम्मीदें, लाखों आंखें, हर गेंद पर नजर। लेकिन जब पिता की तबीयत बिगड़ी, तो रिंकू के सामने स्कोरबोर्ड से बड़ा सवाल खड़ा था। क्या वे मैदान पर रहें? या उस बिस्तर के पास, जहां एक पिता आख़िरी सांसों से लड़ रहा था? उन्होंने टीम कैंप छोड़ा। वह निर्णय आंकड़ों से नहीं, रिश्तों से लिया गया था। खेल इतिहास ऐसे फैसलों को ज्यादा जगह नहीं देता पर इंसानियत देती है।

एक साधारण आदमी की असाधारण विरासत
खांचंद सिंह ने कभी मीडिया को इंटरव्यू नहीं दिए।
वे कैमरों के सामने नहीं आए। उनके नाम पर कोई ट्रॉफी नहीं। लेकिन हर बार जब रिंकू बल्ला उठाते हैं, तो उसमें उस पिता की मेहनत की छाया होती है। उन्होंने बेटे को सिर्फ क्रिकेट नहीं सिखाया —उन्होंने सिखाया संघर्ष, आत्म-सम्मान और परिवार का अर्थ।

हर शॉट में होगी पिता की याद
यह सिर्फ एक खिलाड़ी की निजी त्रासदी नहीं। यह उस भारत की कहानी है —

  • जहां पिता अपनी थकान छुपाकर बच्चों को सपने देते हैं।
  • जहां सख्ती में भी प्यार छिपा होता है
  • और जहां सफलता अकेले की नहीं, पूरे परिवार की जीत होती है।

रिंकू सिंह अब जब भी मैदान पर उतरेंगे, तो वह सिर्फ रन नहीं बनाएंगे। वह हर शॉट में अपने पिता को याद करेंगे। क्योंकि कुछ पारियां स्कोरकार्ड पर नहीं दिखतीं —वे दिल में लिखी जाती हैं।

सिलेंडर ढोते कंधों से शुरू हुई यह कहानी अब आसमान तक पहुंच चुकी है। एक पिता चला गया, लेकिन उसकी दी हुई हिम्मत अभी भी क्रीज पर डटी रहेगी।

RELATED ARTICLES

LEAVE A REPLY

Please enter your comment!
Please enter your name here

- Advertisment -
DGS SOLAR

Most Popular

Recent Comments