लखनऊ, https://dhadkannews.com : उत्तर प्रदेश विधानसभा में महिला आरक्षण के मुद्दे पर बुलाया गया विशेष सत्र गुरुवार को बहस से ज्यादा सियासी टकराव का मंच बन गया। जहां एक ओर महिलाओं के अधिकारों की बात होनी थी, वहीं दूसरी ओर सत्ता पक्ष और विपक्ष के बीच आरोप-प्रत्यारोप और नारेबाजी ने माहौल को पूरी तरह राजनीतिक रंग दे दिया।
🔵 सीएम योगी का तीखा हमला: ‘सपा महिला विरोधी’
मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने सत्र से पहले समाजवादी पार्टी पर तीखा हमला बोलते हुए उसे “जन्मजात महिला विरोधी” करार दिया। उन्होंने पुराने राजनीतिक नारे का हवाला देते हुए कहा कि एक दौर में प्रदेश में महिलाओं की सुरक्षा को लेकर भय का माहौल था। साथ ही उन्होंने कांग्रेस और सपा को महिलाओं के मुद्दे पर असफल बताते हुए उनके राजनीतिक भविष्य पर भी सवाल उठाए।
🔴 सपा का पलटवार: ‘बीजेपी को नैतिक अधिकार नहीं’
वहीं अखिलेश यादव ने मुख्यमंत्री के बयान पर पलटवार करते हुए कहा कि महिलाओं से जुड़े कई मामलों में बीजेपी नेताओं के नाम सामने आए हैं, ऐसे में पार्टी को इस मुद्दे पर बोलने का नैतिक अधिकार नहीं है। सपा ने बीजेपी पर महिला आरक्षण के नाम पर “राजनीतिक एजेंडा” चलाने का आरोप लगाया।
🟡 एक मंच, दो दावे: दोनों पक्ष ‘महिला हितैषी’
दिलचस्प तस्वीर यह रही कि सत्ता पक्ष और विपक्ष—दोनों ही महिला आरक्षण के समर्थन में नजर आए।
- बीजेपी की महिला विधायकों ने पोस्टर-बैनर के साथ समर्थन जताया।
- सपा विधायक भी 33% आरक्षण की मांग को लेकर प्रदर्शन करते दिखे।
लेकिन समर्थन के साथ-साथ दोनों पक्ष एक-दूसरे को “महिला विरोधी” साबित करने में भी पीछे नहीं रहे।
🟢 मुद्दा आरक्षण का या राजनीति का?
सपा का कहना है कि 2023 में संसद द्वारा पारित विधेयक के अनुरूप ही आरक्षण लागू किया जाए, जबकि बीजेपी पर आरोप है कि वह इसे राजनीतिक फायदे के लिए इस्तेमाल करना चाहती है। इस पूरे घटनाक्रम ने एक बड़ा सवाल खड़ा कर दिया है—क्या महिला आरक्षण वास्तव में महिलाओं के सशक्तिकरण का मुद्दा है, या फिर यह भी राजनीति की रणनीति बन चुका है?
यूपी विधानसभा का यह सत्र इस बात का उदाहरण बन गया कि कैसे एक अहम सामाजिक मुद्दा भी राजनीतिक प्रतिस्पर्धा में उलझ जाता है। महिला आरक्षण पर सहमति के बावजूद, राजनीतिक दलों के बीच भरोसे की कमी और आरोपों की राजनीति ने असली मुद्दे को पीछे धकेल दिया।



