विधि संवाददाता, कानपुर https://dhadkannews.com :कानपुर की कचहरी एक बार फिर सवालों के घेरे में है। युवा प्रशिक्षु अधिवक्ता प्रियांशु श्रीवास्तव की मौत ने न सिर्फ न्यायिक परिसर की सुरक्षा व्यवस्था, बल्कि युवाओं पर बढ़ते मानसिक दबाव को भी उजागर कर दिया है।
क्या हुआ उस दोपहर?
गुरुवार दोपहर करीब साढ़े तीन बजे 24 वर्षीय प्रियांशु श्रीवास्तव ने न्यायालय भवन की पांचवीं मंजिल से छलांग लगा दी। मौके पर मौजूद पुलिस और सुरक्षा बल के जवान तुरंत उसे अस्पताल ले गए, लेकिन डॉक्टरों ने उसे मृत घोषित कर दिया।
सुसाइड नोट ने खोले दर्द के राज
घटना से करीब तीन घंटे पहले प्रियांशु ने दो पन्नों का सुसाइड नोट लिखकर अपने व्हाट्सएप स्टेटस पर साझा किया था। इसमें उसने पारिवारिक विवाद, समाज के दबाव और अपने करियर को लेकर निराशा का जिक्र किया। परिजन उसे ढूंढते रहे, लेकिन तब तक बहुत देर हो चुकी थी।
सपनों से संघर्ष तक की कहानी
प्रियांशु हाल ही में विधि स्नातक की परीक्षा पास कर अपने पिता के साथ वकालत का प्रशिक्षण ले रहा था। एक सामान्य दिन की तरह वह कचहरी पहुंचा—सफेद शर्ट, काला कोट और उम्मीदों के साथ, लेकिन भीतर चल रहा संघर्ष किसी को दिखाई नहीं दिया।
सुरक्षा और सिस्टम पर सवाल
जिस स्थान पर प्रियांशु गिरा, वह आमतौर पर बंद रहता है और वहां लोगों की आवाजाही नहीं होती। ऐसे में सवाल उठता है कि आखिर वह वहां तक कैसे पहुंचा? क्या न्यायालय परिसर में सुरक्षा व्यवस्था पर्याप्त है?
पहले भी हो चुकी है ऐसी घटना
यह कोई पहली घटना नहीं है। छह महीने पहले, धनतेरस के दिन, एक स्टेनोग्राफर ने भी न्यायालय भवन की छठवीं मंजिल से कूदकर आत्महत्या कर ली थी। लगातार हो रही ऐसी घटनाएं सिस्टम पर गंभीर प्रश्नचिह्न खड़े करती हैं।
बड़ा सवाल: कौन जिम्मेदार?
क्या यह सिर्फ एक व्यक्तिगत फैसला था, या फिर समाज, परिवार और सिस्टम के दबावों का नतीजा? युवाओं में बढ़ती मानसिक तनाव की समस्या को अब नजरअंदाज करना मुश्किल होता जा रहा है।
प्रियांशु की मौत एक चेतावनी है—सिर्फ परिवारों के लिए नहीं, बल्कि पूरे समाज और व्यवस्था के लिए। जरूरत है संवाद की, समझ की और समय रहते मदद की, ताकि कोई और जिंदगी इस तरह खत्म न हो।



