कानपुर, संवाददाता https://dhadkannews.com:शहर में आवारा कुत्तों का खतरा अब डर से आगे बढ़कर गंभीर सुरक्षा संकट बनता जा रहा है। ताजा मामला बर्रा इलाके का है, जहां 20 वर्षीय युवती पर सड़क के बीचों-बीच कुत्ते ने हमला कर दिया। इस घटना ने एक बार फिर नगर निगम और प्रशासन की तैयारियों पर सवाल खड़े कर दिए हैं।
सड़क पर अचानक हमला, चेहरा बना निशाना
पीड़िता निकिता कुशवाहा, जो एक निजी कंपनी में काम करती हैं, रोज की तरह ऑफिस से घर लौट रही थीं। किदवई नगर से ऑटो बदलने के दौरान अचानक एक आवारा कुत्ता उन पर झपटा और सीधे चेहरे पर हमला कर दिया। हमले में युवती के होंठ बुरी तरह फट गए और चेहरे पर गंभीर चोटें आईं हैं।
सरकारी अस्पताल ने किया मना, निजी में हुआ इलाज
घटना के बाद परिजन तुरंत उन्हें अस्पताल ले गए, लेकिन आरोप है कि सरकारी अस्पताल में भर्ती करने से इनकार कर दिया गया। बाद में निजी अस्पताल में भर्ती कर सर्जरी करानी पड़ी। फिलहाल युवती का इलाज जारी है, लेकिन परिवार आर्थिक और मानसिक दोनों तरह से परेशान है।
परिवार का दर्द: “चेहरे के निशान जिंदगी भर रहेंगे”
पीड़िता की मां का कहना है कि उनकी बेटी घर का सहारा है, लेकिन अब उसके चेहरे पर पड़े गहरे निशान और खाने-पीने में होने वाली परेशानी उन्हें और ज्यादा चिंता में डाल रही है। परिवार का कहना है कि महंगा इलाज उनके बस से बाहर है।
शहर में बढ़ता ‘डॉग अटैक’ ग्राफ
कानपुर में यह कोई पहली घटना नहीं है। हाल के महीनों में कई ऐसे मामले सामने आए हैं, जहां बच्चों और महिलाओं पर कुत्तों के झुंड ने हमला किया। जाजमऊ, कल्याणपुर और श्याम नगर जैसे इलाकों में भी गंभीर घटनाएं सामने आ चुकी हैं, जिनमें कई लोग बुरी तरह घायल हुए।
1 लाख से ज्यादा आवारा कुत्ते, कार्रवाई पर सवाल
अनुमान है कि शहर में 1.30 लाख से ज्यादा आवारा कुत्ते हैं। नगर निगम समय-समय पर नसबंदी और पकड़ने का अभियान चलाने का दावा करता है, लेकिन जमीनी हकीकत कुछ और ही बयां करती है। स्थानीय लोगों का कहना है कि अभियान कागजों तक सीमित है और सड़कों पर खतरा लगातार बढ़ रहा है।
कागजों से बाहर आएगा एक्शन या जारी रहेगा खतरा?
लगातार बढ़ती घटनाओं ने यह सवाल खड़ा कर दिया है कि आखिर कब तक आम लोग इस खतरे के साथ जीने को मजबूर रहेंगे। जरूरत है सख्त और लगातार अभियान की, ताकि सड़कों पर घूम रहे खतरनाक आवारा कुत्तों से लोगों की सुरक्षा सुनिश्चित की जा सके।
कानपुर में आवारा कुत्तों का मुद्दा अब सिर्फ एक नगर निगम की जिम्मेदारी नहीं, बल्कि सार्वजनिक सुरक्षा का बड़ा संकट बन चुका है। अगर जल्द ठोस कदम नहीं उठाए गए, तो ऐसी घटनाएं और भयावह रूप ले सकती हैं।



