Monday, September 28, 2026
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दो लोगों से शुरू हुआ सफर, आज लाखों कदमों की ताकत! 52 साल की SIS कहानी में छिपे हैं संघर्ष, भरोसा और विरासत के कई अध्याय

SIS Founder's Day पर विशेष

नई दिल्ली, https://dhadkannews.com :आज किसी बड़े संगठन की तस्वीर देखिए—बड़ी इमारतें, हजारों साइट्स, तकनीक से लैस ऑपरेशन, मैनेजमेंट की लंबी टीम और देश-दुनिया में फैला कारोबार। लेकिन कभी-कभी इस पूरी तस्वीर के पीछे लौटकर देखना जरूरी होता है।

कहानी तब शुरू होती है, जब न बड़ी इमारत थी, न बड़ा कारोबार और न ही हजारों कर्मचारियों की फौज। था तो सिर्फ एक विचार और उस विचार के साथ थे दो लोग। यही दो लोगों से शुरू हुआ सफर आज SIS Group Enterprises की 52 वर्षों की यात्रा बन चुका है। SIS के आधिकारिक इतिहास के मुताबिक समूह ने 1974 में दो सदस्यों के साथ परिचालन शुरू किया था। लेकिन यह कहानी सिर्फ एक कंपनी के बड़ा होने की नहीं है। यह कहानी है—एक सपने की, एक परिवार के साथ की, ग्राउंड पर खड़े लोगों की, बदलते समय के साथ बदलने कीऔर भरोसे को सबसे बड़ी पूंजी मानने की।

जहां से शुरू हुई कहानी… वहां सिर्फ सपना था

SIS की कहानी के केंद्र में सबसे पहला नाम आता है रविन्द्र किशोर सिन्हा यानी R.K. Sinha का। SIS की आधिकारिक प्रोफाइल के अनुसार R.K. Sinha First-Generation Entrepreneur हैं। राजनीति विज्ञान और कानून की पढ़ाई के बाद उन्होंने पत्रकारिता में अपराध और राजनीतिक रिपोर्टिंग से अपने करियर की शुरुआत की। बाद में सुरक्षा क्षेत्र में एक संगठित सेवा खड़ी करने का विचार उनके मन में आकार लेने लगा।

1971 के भारत-पाक युद्ध के बाद बड़ी संख्या में पूर्व सैनिकों के सामने रोजगार की चुनौती थी। SIS के अनुसार इन्हीं परिस्थितियों में सेवानिवृत्त पूर्व सैनिकों को रोजगार से जोड़ने के उद्देश्य से एक संगठित सुरक्षा सेवा की कल्पना ने जन्म लिया। यही विचार आगे चलकर SIS बना। 2 जनवरी 1974 को SIS के औपचारिक पंजीकरण का उल्लेख कंपनी के इतिहास में मिलता है। उस समय शायद किसी ने नहीं सोचा होगा कि यह छोटी-सी शुरुआत आने वाले दशकों में इतनी बड़ी कहानी लिखेगी।

लेकिन इस कहानी में एक और किरदार था… जो कैमरे के सामने नहीं था

किसी संस्थापक की कहानी लिखते समय अक्सर पूरा ध्यान उसी व्यक्ति पर चला जाता है जिसने पहला कदम उठाया।लेकिन हर बड़े सफर में कुछ ऐसे लोग भी होते हैं, जो पीछे खड़े होकर उस कदम को मजबूती देते हैं। R.K. Sinha की जीवनसंगिनी Rita Kishore Sinha का साथ भी SIS की इस यात्रा का एक महत्वपूर्ण मानवीय अध्याय है।

शुरुआती दौर में जब संसाधन सीमित थे और संगठन को अपनी जगह बनाने के लिए संघर्ष करना था, तब उन्होंने भी पति के साथ इस सफर में कदम से कदम मिलाया। आपके द्वारा साझा किए गए विवरण के अनुसार, उनका जुड़ाव केवल परिवार तक सीमित नहीं था। वह सुरक्षा कर्मियों के बीच जातीं, उनकी जरूरतों को समझतीं और जरूरत पड़ने पर उनकी मदद करती नजर आती थीं।

यानी उस समय जब SIS एक छोटे से प्रयास के रूप में आगे बढ़ रहा था, सुरक्षा कर्मियों और उनके परिवारों के साथ मानवीय रिश्ता भी इस सफर का हिस्सा बन रहा था। आज SIS की आधिकारिक वेबसाइट पर Rita Kishore Sinha को Board की Non-Executive Director के रूप में सूचीबद्ध किया गया है। यहां एक दिलचस्प बात सामने आती है। R.K. Sinha की कंपनी को लेकर बताई गई philosophy है—

“Take care of your people, they will take care of your business.”

SIS अपनी वर्तमान Culture & Values में इसी सोच को Founder’s Mentality का आधार बताता है और कर्मचारियों को संगठन के महत्वपूर्ण brand ambassadors के रूप में रेखांकित करता है। यानी आज जिस People First संस्कृति की बात होती है, उसकी जड़ें संगठन की शुरुआती सोच में दिखाई देती हैं।

दो लोग थे… फिर जुड़ते चले गए हजारों हाथ

SIS का विस्तार किसी एक छलांग का परिणाम नहीं था।

  • पहले सुरक्षा सेवा।
  • फिर नए शहर।
  • फिर नई तकनीक।
  • फिर Facility Management।
  • फिर Cash Logistics।
  • फिर अंतरराष्ट्रीय बाजार।

SIS के आधिकारिक इतिहास में 2006 में Cash Logistics में प्रवेश, 2008 में Australia की Chubb Security का अधिग्रहण और 2009 में Facility Management क्षेत्र में प्रवेश जैसे महत्वपूर्ण पड़ाव दर्ज हैं। हर पड़ाव ने SIS की कहानी में एक नया अध्याय जोड़ा और हर अध्याय के साथ संगठन के साथ जुड़ने वाले लोगों की संख्या भी बढ़ती गई।

फिर आया Rituraj Sinha का दौर… जब विरासत ने मांगी नई रफ्तार

साल 2002। R.K. Sinha के बेटे Rituraj Kishore Sinha SIS Group से जुड़े। आज वे Group Managing Director हैं। SIS के अनुसार उन्होंने संगठन की वृद्धि को गति देने, रणनीतिक साझेदारियों और वैश्विक विस्तार में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई।

लेकिन Rituraj Sinha के दौर की कहानी सिर्फ विस्तार की नहीं थी। यह उस समय की कहानी थी जब एक भारतीय सुरक्षा कंपनी को यह तय करना था कि—क्या वह सिर्फ भारत तक सीमित रहेगी या दुनिया के बड़े बाजारों में भी अपनी पहचान बनाएगी? SIS की अपनी प्रकाशित कहानी के अनुसार, 2008 में Australia की Chubb Security को खरीदने का फैसला इसी वैश्विक विस्तार की सोच का बड़ा उदाहरण था। उस समय यह अधिग्रहण SIS के आकार से कई गुना बड़े कारोबार से जुड़ा था और खुद Rituraj Sinha ने इसे एक बड़ा जोखिम बताया था। यही वह मोड़ था जब SIS की कहानी में “स्थानीय शुरुआत” से “वैश्विक सोच” का अध्याय खुला।

सिर्फ कंपनी नहीं बढ़ी… लीडर भी तैयार हुए

SIS की यात्रा का एक ऐसा पहलू भी है, जो शायद उसकी सबसे बड़ी विरासतों में से एक है—Training और Leadership Development।

कंपनी के अनुसार R.K. Sinha ने 1984 में Officer Cadre की अवधारणा शुरू की थी। बाद में GTO कार्यक्रम के जरिए सुरक्षा अधिकारियों और मैनेजर्स की नई पीढ़ी तैयार करने पर जोर दिया गया। SIS के मुताबिक Officers Academy से अब तक 36 बैचों में 2,000 से ज्यादा Officers प्रशिक्षित हो चुके हैं। यानी SIS की कहानी में सवाल सिर्फ यह नहीं था—

“कितने कर्मचारी हमारे साथ हैं?” सवाल यह भी था—“इनमें से कितने कल के लीडर बनेंगे?” यही सोच किसी संगठन को सिर्फ बड़ा नहीं करती, बल्कि उसे लंबे समय तक चलने वाली संस्था में बदलती है।

आज की कहानी—Dhiraj Singh और नई दुनिया की चुनौतियां

आज Security Industry उस दौर में नहीं है, जहां केवल गेट पर खड़ा सुरक्षा कर्मी ही पूरी तस्वीर हुआ करता था।

अब तस्वीर बदल चुकी है। AI है। Digital Surveillance है। Data Analytics है। Automation है। Smart Monitoring है। Integrated Facility Solutions हैं।

ग्राहक की अपेक्षाएं बदली हैं और सुरक्षा का अर्थ भी लगातार विस्तार ले रहा है। इसी बदलते दौर में Dhiraj Singh, CEO, SIS India की भूमिका सामने आती है। SIS की 2024-25 Annual Report में Dhiraj Singh को CEO, SIS India के रूप में Leadership Team में सूचीबद्ध किया गया है। SIS की Group Management Committee के अनुसार, SIS में आने से पहले उन्होंने infrastructure और services sectors में startup businesses स्थापित और संचालित किए थे। आज उनके सामने चुनौती सिर्फ कारोबार को आगे बढ़ाने की नहीं है।चुनौती है—पांच दशक की विरासत को नई तकनीक और बदलते कारोबारी माहौल के साथ जोड़ना।

52 साल… लेकिन SIS को सिर्फ आंकड़ों से मत देखिए

कंपनी की यात्रा को आंकड़ों में देखना आसान है। 1974—2 सदस्य। आज—Security, Facility Management और Cash Logistics के क्षेत्र में विस्तृत कारोबार और भारत के साथ Australia, New Zealand और Singapore तक वैश्विक मौजूदगी। लेकिन इन आंकड़ों के पीछे असली कहानी है—वह Security Guard जो रातभर जागता है। वह Supervisor जो शिफ्ट बदलने तक साइट पर खड़ा रहता है। वह Operations Executive जो ग्राहक की समस्या सुनकर मौके पर पहुंचता है। वह Branch Manager जो टीम और ग्राहक के बीच संतुलन बनाता है। वह परिवार जो अपने सदस्य के काम पर भरोसा करता है। और वह कर्मचारी जो वर्षों तक एक ही संगठन के साथ अपनी पहचान बनाता है। यही वे कदम हैं, जिनसे SIS का कारवां बना।

R.K. Sinha की सोच से Rituraj Sinha और Dhiraj Singh के दौर तक… कहानी में क्या बदला?

R.K. Sinha का दौर—एक विचार को वास्तविकता में बदलने का दौर।

Rita Kishore Sinha का साथ—परिवार से लेकर सुरक्षा कर्मियों तक मानवीय जुड़ाव का अध्याय।

Rituraj Sinha का दौर—विस्तार, रणनीतिक साझेदारियों और वैश्विक सोच का दौर।

Dhiraj Singh का दौर—नई तकनीक, बदलती ग्राहक अपेक्षाओं और नए कारोबारी वातावरण के बीच SIS India को आगे बढ़ाने का दौर।

नाम बदले, समय बदला, चुनौतियां बदलीं… लेकिन कारवां चलता रहा।

Founder Day पर याद रखने वाली बात… कंपनी सिर्फ इमारत नहीं होती

Founder Day पर अक्सर उपलब्धियां गिनाई जाती हैं। लेकिन SIS की 52 साल की कहानी को अगर एक वाक्य में समझना हो तो शायद वह यह होगी—

“एक विचार तब बड़ा बनता है, जब लोग उस पर भरोसा करके उसके साथ चलने लगते हैं।”

R.K. Sinha ने विचार रखा, परिवार ने साथ दिया। कर्मचारियों ने उसे जमीन पर उतारा। नेतृत्व ने उसे विस्तार दिया और समय ने उसे परखा।

आज 52 साल बाद SIS का Founder Day इसी लंबी यात्रा की याद है।

और अब अगला सवाल—अगले 52 साल की कहानी कौन लिखेगा?

क्या आने वाले वर्षों में AI सुरक्षा व्यवस्था को बदल देगा? क्या Security Guard की भूमिका technology-enabled professional में बदलती जाएगी? क्या Data और Analytics सुरक्षा के फैसले लेने का नया आधार बनेंगे?क्या आने वाली पीढ़ी के लिए सुरक्षा और Facility Management में नए career opportunities पैदा होंगे? और सबसे महत्वपूर्ण—

क्या “People First” की वह सोच, जिससे यह सफर शुरू हुआ था, तकनीक से भरी नई दुनिया में भी उतनी ही मजबूत रहेगी?

इन सवालों के जवाब भविष्य देगा। लेकिन अतीत की तस्वीर सामने है। 1974 में दो लोग। और फिर—लाखों कदम।हजारों साइट्स। असंख्य ड्यूटी घंटे। अनगिनत परिवार और 52 साल की एक ऐसी यात्रा, जिसमें एक छोटे विचार ने धीरे-धीरे एक बड़े कारवां का रूप ले लिया।

52 साल पूरे हुए हैं… कहानी अभी बाकी है!

यह सिर्फ SIS की Anniversary नहीं। यह उन लोगों को याद करने का दिन है जिन्होंने पहली ईंट रखी।उन लोगों को याद करने का दिन है जिन्होंने मुश्किल समय में साथ दिया। उन सुरक्षा कर्मियों को सलाम करने का दिन है जो आज भी किसी न किसी गेट, साइट या परिसर पर खड़े होकर अपनी ड्यूटी निभा रहे हैं। और उन परिवारों को सम्मान देने का दिन है जिनके सपनों और उम्मीदों में इस सफर की अपनी जगह है। R.K. Sinha का सपना…परिवार का साथ…Rituraj Sinha की विस्तार यात्रा…Dhiraj Singh के दौर की नई चुनौतियां…और लाखों कदमों की मेहनत…

यही है SIS के 52 साल की कहानी। Founder Day पर सवाल सिर्फ यह नहीं कि SIS ने 52 साल में क्या हासिल किया? सवाल यह भी है—इन 52 वर्षों में SIS ने कितनी जिंदगियों को अपने सफर से जोड़ा? और शायद यही किसी भी संगठन की सबसे बड़ी विरासत होती है।

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