ज्योति सिंह
नई दिल्ली, https://dhadkannews.com :लोकसभा में महिला आरक्षण बिल भले ही संख्याओं की कसौटी पर पास न हो पाया हो, लेकिन सियासत की जमीन पर इसकी लड़ाई अब और तेज होने वाली है। दो दिन की लंबी बहस के बाद जब यह बिल 298 वोटों के समर्थन के बावजूद जरूरी दो-तिहाई बहुमत हासिल नहीं कर सका, तो संसद के अंदर की हार को बीजेपी ने सड़क की लड़ाई में बदलने का संकेत दे दिया।
संसद के भीतर की गणित भले ही बिल के खिलाफ गई हो, लेकिन सत्ता पक्ष इसे नैतिक जीत के तौर पर पेश करने की तैयारी में है। सरकार अब इस मुद्दे को सीधे जनता के बीच ले जाकर विपक्ष को “महिला विरोधी” साबित करने की रणनीति पर काम कर रही है।
गृहमंत्री अमित शाह के भाषण ने इस रणनीति की झलक साफ कर दी। उन्होंने विपक्ष के ऐतिहासिक रुख पर सवाल उठाते हुए कांग्रेस पर महिला आरक्षण को लेकर लगातार विरोध का आरोप लगाया।
इधर, प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने इस बहस को भावनात्मक रंग देते हुए सांसदों से अपील की कि वे अपनी अंतरात्मा की आवाज सुनें और देश की महिलाओं के सम्मान को प्राथमिकता दें। यह अपील अब बीजेपी के चुनावी अभियान का अहम हिस्सा बनती दिख रही है।
विपक्ष का पलटवार—राहुल और प्रियंका का बयान
बिल गिरने के बाद कांग्रेस ने भी अपना रुख स्पष्ट किया। राहुल गांधी ने कहा कि सरकार ने इस बिल को सही तरीके और व्यापक सहमति के साथ पेश नहीं किया, जिसके चलते यह जरूरी समर्थन नहीं जुटा पाया। उन्होंने आरोप लगाया कि सरकार ने इसे गंभीर सुधार की बजाय राजनीतिक मुद्दा बनाने की कोशिश की।
वहीं प्रियंका गांधी ने और भी तीखा बयान देते हुए कहा कि “यह बिल जिस तरह लाया गया, उसे गिरना ही था।” उनका कहना था कि सरकार की नीयत महिलाओं को वास्तविक प्रतिनिधित्व देने की नहीं, बल्कि चुनावी फायदा उठाने की थी।
चुनावी राज्यों में बनेगा बड़ा मुद्दा
पश्चिम बंगाल और तमिलनाडु जैसे राज्यों में जारी चुनावों के बीच बीजेपी इस मुद्दे को बड़े पैमाने पर उठाने की तैयारी में है। पार्टी जनता के बीच यह संदेश ले जाने की कोशिश करेगी कि विपक्ष ने महिलाओं के अधिकारों को रोक दिया। पीएम मोदी के आगामी दौरे—23 अप्रैल को कृष्णानगर और 24 अप्रैल को 24 परगना—की सभाओं में महिला आरक्षण बिल का मुद्दा प्रमुखता से उठ सकता है।
रणनीति स्पष्ट—संसद से सड़क तक लड़ाई
संसद में बिल गिरने के तुरंत बाद NDA की बैठक बुलाना इस बात का संकेत है कि बीजेपी इसे राजनीतिक अवसर में बदलने की पूरी तैयारी कर चुकी है। पार्टी पहले भी देशभर में महिलाओं के बीच इस बिल को लेकर अभियान चला चुकी है और अब इसे और आक्रामक तरीके से आगे बढ़ाया जाएगा।
आने वाले दिनों में यह साफ होगा कि महिला आरक्षण बिल सिर्फ एक विधायी मुद्दा रहता है या फिर यह चुनावी राजनीति का सबसे बड़ा हथियार बन जाता है। फिलहाल, यह लड़ाई अब संसद से निकलकर सीधे जनता के बीच पहुंच चुकी है।



