Monday, September 28, 2026
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14 बार उठी आपत्ति, फिर भी नहीं रुका सिस्टम! ‘वोट चोरी’ के आरोपों ने बढ़ाई सियासी तपिश

नई दिल्ली, https://dhadkannews.com : भारत में चुनाव पर भरोसा सिर्फ इसलिए कायम नहीं रहता कि हर पांच साल में मतदान हो जाता है। भरोसा इसलिए बनता है क्योंकि मतदाता को यकीन होता है कि उसका नाम मतदाता सूची में रहेगा, उसका वोट सुरक्षित रहेगा और चुनाव कराने वाली संस्था निष्पक्ष नियमों के तहत काम करेगी।

लेकिन The Indian Express की 23-24 सितंबर 2026 की जांच ने इसी भरोसे के सबसे संवेदनशील हिस्से पर सवाल खड़ा कर दिया है। रिपोर्ट के मुताबिक, चुनाव आयोग के तीन सदस्यों में से दो—सुखबीर सिंह संधू और विवेक जोशी—ने पिछले 10 महीनों में आयोग के विभिन्न फैसलों और प्रक्रियाओं पर कम-से-कम 14 बार रिकॉर्ड पर आपत्ति दर्ज की। इनमें मतदाता जोड़ने, नाम हटाने, Form-6 में बदलाव और चुनावी डेटा-सिस्टम के केंद्रीकरण जैसे मुद्दे शामिल बताए गए हैं।

यहीं से कहानी सिर्फ विपक्ष के ‘वोट चोरी’ के आरोप तक सीमित नहीं रहती। कहानी का असली सवाल है—अगर चुनाव कराने वाली संस्था के भीतर ही दो सदस्य बार-बार लाल झंडा दिखा रहे थे, तो उनकी आपत्तियों पर हुआ क्या?

14 आपत्तियां… लेकिन सवाल अभी भी जिंदा

सोचिए—एक तरफ देश में विपक्ष आरोप लगा रहा था कि मतदाता सूची से छेड़छाड़ हो रही है। दूसरी तरफ चुनाव आयोग के भीतर ही दो आयुक्त अलग-अलग मौकों पर प्रक्रियाओं को लेकर आपत्ति दर्ज कर रहे थे।और अब Indian Express की जांच उन रिकॉर्डेड आपत्तियों को सामने रख रही है।

यह कहना कि इन आपत्तियों से “वोट चोरी साबित हो गई”, तथ्यों से आगे जाना होगा। लेकिन यह कहना भी मुश्किल है कि इन सवालों को नजरअंदाज कर दिया जाए। क्योंकि चुनावी लोकतंत्र में सबसे संवेदनशील दस्तावेज कोई राजनीतिक भाषण नहीं—मतदाता सूची होती है।

Form-6 पर सवाल: नए वोटर के दरवाजे पर नया सवाल क्यों?

Indian Express की एक अन्य रिपोर्ट के मुताबिक, नए मतदाताओं के पंजीकरण के लिए इस्तेमाल होने वाले Form-6 में ECINet पोर्टल पर एक नया declaration जोड़ा गया।

रिपोर्ट के अनुसार, दो चुनाव आयुक्तों ने मई में इस बदलाव पर आपत्ति जताते हुए सवाल उठाया कि इसके लिए Registration of Electors Rules, 1960 में संशोधन की आवश्यकता थी। इसके बावजूद declaration जोड़े जाने का आरोप सामने आया। रिपोर्ट में यह भी कहा गया कि यह हिस्सा तकनीकी रूप से mandatory के रूप में चिह्नित नहीं था, लेकिन आवेदक उसके जवाब के बिना form आगे submit नहीं कर सकता था। यानी सवाल सिर्फ एक ऑनलाइन फॉर्म का नहीं है।सवाल यह है कि वोटर के अधिकार से जुड़ी प्रक्रिया में नियम पहले चलते हैं या सिस्टम पहले बना दिया जाता है?

डेटा दिल्ली में, अधिकार जमीन पर?

विवाद का दूसरा सिरा चुनावी डेटा और ECINet से जुड़ता है।

Indian Express की रिपोर्ट के मुताबिक, दोनों आयुक्तों ने मतदाता डेटाबेस और चुनावी सॉफ्टवेयर के केंद्रीकरण को लेकर चिंता जताई थी।

और फिर सामने आया गोवा का 97 मतदाताओं वाला मामला। रिपोर्ट के अनुसार, Goa के Electoral Registration Officers ने 97 मतदाताओं को जांच के बाद eligible माना था। लेकिन स्थानीय अधिकारियों के पास उन्हें software के जरिए दोबारा शामिल करने की क्षमता नहीं थी क्योंकि संबंधित permission दिल्ली से नियंत्रित थी।

Goa के मुख्य निर्वाचन अधिकारी ने Indian Express को बताया कि ERO स्तर पर voters को re-include करने की व्यवस्था होनी चाहिए। रिपोर्ट के अनुसार, 21 फरवरी को final roll प्रकाशित होने के बाद भी 20 सितंबर तक वे 97 नाम सूची में वापस नहीं आए थे।

अब सवाल बेहद सीधा है—

अगर स्थानीय चुनाव अधिकारी किसी नागरिक को पात्र मान चुके हैं, तो अंतिम दरवाजा किसके हाथ में है?

13 करोड़ नामों का सवाल और उससे भी बड़ा सवाल

SIR यानी Special Intensive Revision को लेकर पहले से ही देश में राजनीतिक बहस तेज है।

Indian Express की रिपोर्टिंग में 30 राज्यों और केंद्रशासित प्रदेशों में draft electoral rolls से लगभग 13 करोड़ नाम हटाए जाने/जांच के दायरे में आने की बात सामने आई है। यहां एक जरूरी फर्क समझना होगा। मतदाता सूची का revision अपने आप में गलत प्रक्रिया नहीं है। मृत, स्थानांतरित, duplicate या अयोग्य entries हटाना चुनावी सूची को साफ रखने की सामान्य जिम्मेदारी है। लेकिन असली सवाल तब पैदा होता है जब—

  • पात्र मतदाता का नाम हट जाए,
  • उसे दोबारा जोड़ने की प्रक्रिया कठिन हो,
  • स्थानीय अधिकारी सुधार करना चाहें लेकिन तकनीकी बाधा आए,
  • और ऊपर से आयोग के भीतर ही प्रक्रिया पर आपत्तियां दर्ज हों।

तब सवाल उठता है—

सिस्टम किसके लिए बनाया गया है—मतदाता की सुविधा के लिए या मतदाता को साबित करने के लिए कि वह वोट देने योग्य है?

BJP पर भी सवाल, लेकिन जवाब भी जरूरी

इस पूरे विवाद में BJP को भी सीधे कटघरे में खड़ा किया जा रहा है क्योंकि विपक्ष लंबे समय से चुनावी प्रक्रिया और मतदाता सूची को लेकर आरोप लगाता रहा है।

लेकिन यहां तथ्य और आरोप को अलग रखना जरूरी है। वोट चोरी का आरोप अभी राजनीतिक आरोप है; इसे न्यायिक रूप से सिद्ध तथ्य के रूप में पेश नहीं किया जा सकता।

BJP ने चुनाव आयोग का बचाव करते हुए कहा है कि आयोग के भीतर अलग-अलग राय होना निर्णय प्रक्रिया का सामान्य हिस्सा है। पार्टी ने इसे लोकतांत्रिक deliberation का हिस्सा बताया है। यानी BJP का पक्ष साफ है—असहमति = संस्थागत साजिश नहीं।

लेकिन दूसरी तरफ विपक्ष का सवाल है—

अगर असहमति दर्ज हुई, तो उसका जवाब सार्वजनिक क्यों नहीं?

ज्ञानेश कुमार के सामने सबसे बड़ा सवाल क्या है?

यह सवाल यह नहीं होना चाहिए कि—“आप BJP के साथ हैं या विपक्ष के साथ?”बल्कि सवाल होना चाहिए—“आपके ही आयोग के दो सदस्य जिन फैसलों पर लिखित आपत्ति कर रहे थे, उन आपत्तियों का निपटारा किस आधार पर हुआ?”

Indian Express के अनुसार, आयोग ने 14 notes के अस्तित्व, तारीख या सामग्री से इनकार नहीं किया है। आयोग ने इन्हें suggestions/observations बताते हुए कहा कि पिछले वर्ष के फैसले सर्वसम्मति से लिए गए।

यही जवाब विवाद को और दिलचस्प बनाता है। क्योंकि यदि फैसले सर्वसम्मति से हुए—तो 14 आपत्तियों का अंतिम निपटारा कैसे हुआ?

अगर वे केवल सुझाव थे—तो क्या उन सुझावों पर क्या कार्रवाई हुई, इसका रिकॉर्ड सार्वजनिक होना चाहिए?

और यदि दो आयुक्त लगातार असहमति दर्ज कर रहे थे—तो जनता को यह जानने का अधिकार क्यों न हो कि असहमति के बावजूद फैसला किस तर्क पर कायम रखा गया?

‘वोट चोरी’ से आगे की कहानी

यहां का सबसे अहम सवाल यही है—क्या हर मतदाता सूची की गड़बड़ी को ‘वोट चोरी’ कहना सही है? या नहीं।क्या हर चुनाव आयोग के फैसले को साजिश मान लेना सही है? या नहीं। लेकिन—क्या चुनाव आयोग के भीतर दर्ज गंभीर आपत्तियों पर पारदर्शी जवाब मांगना लोकतंत्र विरोधी है? बिल्कुल नहीं। यही इस पूरी कहानी का सबसे महत्वपूर्ण हिस्सा है। क्योंकि अगर चुनाव आयोग मजबूत है, तो सवालों के जवाब देने से उसकी ताकत कम नहीं होगी। बल्कि जवाबदेही उसकी विश्वसनीयता को मजबूत करेगी।

अब गेंद किसके पाले में है?

इस समय तीन पक्षों के सामने तीन अलग-अलग जिम्मेदारियां हैं।

  • चुनाव आयोग के सामने:

14 आपत्तियों का बिंदुवार जवाब और SIR/ECINet से जुड़े फैसलों की स्पष्ट प्रक्रिया।

  • BJP के सामने:

विपक्ष के आरोपों को केवल राजनीतिक शोर बताने के बजाय मतदाता सूची से जुड़े सवालों पर ठोस तथ्य सामने रखना।

  • विपक्ष के सामने:

‘वोट चोरी’ जैसे गंभीर आरोपों को दस्तावेजी प्रमाण और सत्यापन योग्य आंकड़ों के साथ जनता के सामने रखना।

और सबसे ऊपर—

जनता के सामने अपना सवाल रखने का अधिकार।

क्योंकि लोकतंत्र में असली मालिक न BJP है, न कांग्रेस, न कोई दूसरा दल और न ही कोई चुनाव अधिकारी।असली ताकत उस नागरिक के पास है, जिसकी उंगली पर लगी स्याही से सत्ता तय होती है।

‘DHADKAN NEWS’ का सवाल

अगर चुनाव आयोग में सब कुछ पारदर्शी था, फैसले सर्वसम्मत थे और प्रक्रियाएं नियमों के मुताबिक थीं—तो फिर 14 लिखित आपत्तियों के हर बिंदु का जवाब सार्वजनिक रूप से क्यों न दिया जाए?

यही जवाब तय करेगा कि यह विवाद केवल राजनीतिक तूफान है—

या फिर चुनावी व्यवस्था के अंदर उठी ऐसी घंटी, जिसकी आवाज अब पूरे देश को सुननी चाहिए।‘वोट चोरी’ का नारा राजनीतिक हो सकता है, लेकिन वोटर का नाम, वोटर का अधिकार और चुनावी प्रक्रिया—ये किसी पार्टी की संपत्ति नहीं हैं।यही लोकतंत्र की असली परीक्षा है।

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