Wednesday, October 14, 2026
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आरोप गंभीर, सवाल बड़े! CEC ज्ञानेश कुमार के बचाव में सत्ता, जांच पर सन्नाटा

निर्विघ्न सिंह | DHADKAN NEWS

नई दिल्ली, https://dhadkannews.com : चुनाव लोकतंत्र की ताकत है, लेकिन इस ताकत की बुनियाद जनता का भरोसा है। जब चुनाव कराने वाली सर्वोच्च संस्था की कार्यप्रणाली पर सवाल उठें, तो जवाबदेही तय करना जरूरी हो जाता है। मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार को लेकर जारी विवाद अब इसी बुनियादी सवाल पर आ खड़ा हुआ है—आरोपों का जवाब जांच और तथ्यों से मिलेगा या राजनीतिक बयानों से?

The Indian Express की 23-24 सितंबर 2026 की पड़ताल के मुताबिक, चुनाव आयुक्त सुखबीर सिंह संधू और विवेक जोशी ने पिछले लगभग 10 महीनों में आयोग के फैसलों और प्रक्रियाओं पर कम-से-कम 14 बार रिकॉर्ड पर आपत्तियां दर्ज की थीं। रिपोर्ट में मतदाता सूची, नाम जोड़ने-हटाने, Form-6 और चुनावी डेटा-सिस्टम से जुड़े मुद्दों का उल्लेख किया गया। हालांकि, ये आपत्तियां दर्ज की थीं। रिपोर्ट में मतदाता सूची, नाम जोड़ने-हटाने, Form-6 और चुनावी डेटा-सिस्टम से जुड़े मुद्दों का उल्लेख किया गया। हालांकि, ये आपत्तियां अपने आप में चुनावी धांधली का प्रमाण नहीं हैं, लेकिन इनके निपटारे और निर्णय प्रक्रिया पर पारदर्शी स्पष्टीकरण की मांग जरूर उठाती हैं।

सवाल जांच का, चर्चा बचाव की!

इस पूरे मामले में केंद्र सरकार के रुख पर भी सवाल उठ रहे हैं। विपक्ष ज्ञानेश कुमार के इस्तीफे और मामले की निष्पक्ष जांच की मांग कर रहा है, जबकि सत्ताधारी दल के कुछ नेताओं के बयान उनके समर्थन में सामने आए हैं। आलोचकों का सवाल है कि जब मामला चुनावी निष्पक्षता और संवैधानिक संस्था की विश्वसनीयता से जुड़ा है, तो बहस का केंद्र आरोपों की तथ्यात्मक समीक्षा क्यों नहीं बन रहा?

अगर आरोप निराधार हैं, तो दस्तावेजों के साथ जवाब सामने आना चाहिए। और अगर प्रक्रियाओं पर गंभीर सवाल हैं, तो उनकी निष्पक्ष समीक्षा की मांग को खारिज क्यों किया जाए?

यह कहना कि सरकार और मुख्य चुनाव आयुक्त के बीच सांठगांठ है, बिना प्रमाण उचित नहीं होगा। लेकिन सरकार से यह पूछना बिल्कुल जायज है कि वह पारदर्शिता और जवाबदेही सुनिश्चित करने के लिए क्या कदम उठाने के पक्ष में है। किसी नेता का समर्थन न तो आरोपों को साबित करता है, न उन्हें अपने आप खारिज करता है।

आयोग का जवाब भी जरूरी, सरकार की जवाबदेही भी

चुनाव आयोग ने अपना पक्ष रखते हुए कहा कि SIR सहित उसके फैसले तीनों चुनाव आयुक्तों की मंजूरी से लिए गए थे। ऐसे में अगला सवाल है—रिकॉर्ड पर दर्ज आपत्तियों का निपटारा कैसे हुआ और संबंधित प्रक्रियाओं की जानकारी कितनी सार्वजनिक की जा सकती है?

Form-6 और मतदाता सूची के विशेष गहन पुनरीक्षण यानी SIR को लेकर उठे सवाल सीधे मतदाता के अधिकार से जुड़े हैं। इसलिए सरकार और आयोग, दोनों को नियमों, आदेशों और निर्णय प्रक्रिया के आधार पर स्थिति स्पष्ट करनी चाहिए।

विपक्ष की इस्तीफे की मांग एक राजनीतिक मांग है; वहीं आरोपों की सत्यता का निर्धारण प्रमाणों और उचित कानूनी प्रक्रिया से ही होना चाहिए। लेकिन किसी संवैधानिक पद को सवालों से परे भी नहीं माना जा सकता।

‘DHADKAN NEWS’ का सीधा सवाल

जब चुनाव आयोग के भीतर दर्ज आपत्तियों की रिपोर्ट सामने है, तो जनता को स्पष्ट जवाब कब मिलेगा?

केंद्र सरकार बताए कि क्या वह इस मामले में पारदर्शी समीक्षा और उपलब्ध कानूनी प्रक्रियाओं के तहत जांच की मांग पर अपना स्पष्ट रुख रखेगी। चुनाव आयोग बताए कि आपत्तियों पर क्या कार्रवाई हुई। और विपक्ष भी अपने आरोपों को दस्तावेजों के साथ सामने रखे।

लोकतंत्र में असहमति को राजनीतिक दुश्मनी समझना और सवालों को केवल बयानबाजी से दबाने की कोशिश करना भरोसा मजबूत नहीं करता। जनता को न किसी व्यक्ति को पहले से दोषी ठहराने की जरूरत है, न किसी को जवाबदेही से ऊपर रखने की।

आखिर चुनावी व्यवस्था पर भरोसा भाषणों से नहीं, पारदर्शी प्रक्रिया से बनेगा। यही ज्ञानेश कुमार विवाद की असली कसौटी है।

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