मुंबई: करीब छह साल से सवालों, दावों और विवादों के बीच रहा दिशा सालियान मौत मामला अब जांच के एक नए दौर में प्रवेश कर चुका है। बॉम्बे हाईकोर्ट के आदेश के बाद केंद्रीय जांच ब्यूरो (CBI) ने इस मामले में FIR दर्ज कर जांच शुरू कर दी है। अब सबसे बड़ा सवाल यह है कि 8 जून 2020 की उस रात आखिर हुआ क्या था?
CBI ने जांच की जिम्मेदारी अनुभवी अधिकारी SP सीमा पाहुजा को सौंपी है। रिपोर्टों के मुताबिक, जांच टीम उस रात दिशा के मंगेतर रोहन रॉय के घर हुई गैदरिंग में मौजूद लोगों के बयान दर्ज करने की दिशा में आगे बढ़ रही है।
अब जांच सिर्फ फाइलों तक नहीं रहेगी
छह साल पुराने मामले में CBI के सामने सबसे बड़ी चुनौती उन सबूतों और बयानों को दोबारा जोड़ना होगी, जो घटना के समय दर्ज किए गए थे। जांच के संभावित प्रमुख बिंदुओं में शामिल हैं—
- घटनास्थल का दोबारा निरीक्षण और जरूरत पड़ने पर क्राइम सीन रिक्रिएशन
- उस रात मौजूद लोगों के बयान
- दिशा के मोबाइल फोन और डिजिटल डाटा की जांच
- कॉल रिकॉर्ड और मैसेज की पड़ताल
- घटनास्थल से जुड़े तकनीकी एवं फॉरेंसिक साक्ष्यों का विश्लेषण
- पहले की पुलिस जांच के दस्तावेजों और बयानों की समीक्षा
- पोस्टमार्टम और मेडिकल रिकॉर्ड की दोबारा जांच
CBI अधिकारियों ने जांच शुरू होने के साथ ही बयान दर्ज करने की प्रक्रिया आगे बढ़ाई है।
8 जून की रात—कौन था कहां?
अब जांच का एक अहम हिस्सा उस रात की टाइमलाइन तैयार करना हो सकता है।
- दिशा किसके संपर्क में थीं?
- कौन-कौन उनके साथ था?
- घटना से पहले क्या हुआ?
- घटना के बाद किसने किससे संपर्क किया?
इन सवालों के जवाब मोबाइल रिकॉर्ड, कॉल डिटेल, मैसेज, उपलब्ध इलेक्ट्रॉनिक डाटा और गवाहों के बयानों को आपस में मिलाकर तलाशे जा सकते हैं। यही वह कड़ी है जिसके जरिए जांच एजेंसी घटना की परिस्थितियों को समझने की कोशिश करेगी।
सुशांत सिंह राजपूत से कनेक्शन की भी होगी पड़ताल?
दिशा सालियान की मौत के कुछ ही दिनों बाद अभिनेता सुशांत सिंह राजपूत की मौत ने दोनों घटनाओं को सार्वजनिक चर्चा में जोड़ दिया था।
CBI के सामने यह भी महत्वपूर्ण सवाल रहेगा कि क्या दोनों घटनाओं के बीच कोई तथ्यात्मक संबंध सामने आता है या नहीं। हालांकि, किसी भी कनेक्शन को स्थापित करने के लिए केवल समानता या समय-क्रम पर्याप्त नहीं होगा। इसके लिए जांच एजेंसी को ठोस दस्तावेजी, इलेक्ट्रॉनिक, फॉरेंसिक या प्रत्यक्ष साक्ष्य की जरूरत होगी।
सुशांत सिंह राजपूत की मौत के मामले में CBI पहले ही क्लोजर रिपोर्ट दाखिल कर चुकी है; इसलिए दोनों मामलों के बीच किसी भी संभावित संबंध को लेकर निष्कर्ष जांच के साक्ष्यों पर ही निर्भर करेगा।
पुरानी जांच भी CBI के रडार पर
इस मामले में CBI सिर्फ घटना की रात पर ही नहीं, बल्कि पहले हुई पुलिस जांच की प्रक्रिया पर भी गौर कर सकती है।
- किस अधिकारी ने क्या बयान दर्ज किया?
- कौन सा सबूत कब मिला?
- पोस्टमार्टम और घटनास्थल से संबंधित रिकॉर्ड कैसे तैयार हुए?
- क्या जांच के दौरान किसी तथ्य की अनदेखी हुई?
इन सवालों के जवाब पुराने केस रिकॉर्ड और संबंधित अधिकारियों के बयानों से तलाशे जा सकते हैं।
FIR में नाम आने का मतलब दोष साबित होना नहीं
मामले में कई चर्चित नामों का उल्लेख सामने आया है, लेकिन यहां एक महत्वपूर्ण कानूनी पहलू है।
बॉम्बे हाईकोर्ट ने CBI जांच का आदेश देते समय स्पष्ट किया था कि सिर्फ FIR या शिकायत में नाम होने से किसी व्यक्ति को आरोपी या दोषी नहीं माना जा सकता। जांच के दौरान पर्याप्त सामग्री और उचित संदेह मिलने के बाद ही किसी की भूमिका तय की जा सकती है।यानी फिलहाल नामों से ज्यादा महत्वपूर्ण होगा—CBI के हाथ लगने वाला सबूत।
अब असली परीक्षा सबूतों की
दिशा सालियान केस छह साल पुराना है। इतने लंबे समय के बाद इलेक्ट्रॉनिक रिकॉर्ड, डिजिटल डाटा, गवाहों की स्मृति और पुराने दस्तावेजों की विश्वसनीयता की जांच CBI के लिए महत्वपूर्ण चुनौती होगी।
लेकिन अब जांच की दिशा साफ है—पुरानी फाइलों को फिर खोलना, उस रात की घटनाओं की टाइमलाइन बनाना और हर दावे को उपलब्ध सबूतों से मिलाना।
छह साल बाद इस केस में सबसे बड़ा सवाल यही नहीं है कि किसने क्या कहा? बल्कि यह है—“किसके पास उस रात की कहानी साबित करने वाला सबूत है?”
अब इस सवाल का जवाब CBI की जांच से तलाशा जाएगा।



